मेरे किनारे पे मेकोंग नदी लेटती है
यहाँ सूरज को
सिर्फ दो कदम चलकर डूबना होता है
रात भर सूरज डूबा रह कर
भले हीँ लौटता हो ठंढा होकर सुबह-सुबह
नदी सूखती जाती है थोड़ी-थोड़ी रोज
मेरे किनारे मेकोंग नदी लेटी है
मैं देर तक बैठता हूँ उसके किनारे
क्या पता कल वो हो न हो
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13 comments:
भाव भरे रहेंगे तो नदी भी नहीं सूखेगी।
विचारोत्तेजक कविता।
और जब कल
वो नही होगी तब..
सूरज कहाँ डूबेगा?
कितने कदम चलेगा?
और तब ठंडा न हो पाया तो..
और कितना जलेगा?
मैं सोचता हूँ भले ही वो जले..
पर मैं.. तब कहाँ बैठूँगा?...
निश्चिंत रहें सूरज की तपिश नदी नहीं सुखाती है..
कोई और तपिश है जो नदी सुखा रही है.
नदी सूखती है थोड़ी थोड़ी हर दिन ... वाह
खूबसूरत अभिव्यक्ति
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
shaayd lupt ho jaayegi kisi din...
bahut sundar!
Nadi ka ek din n hona .......! marmik !
http://urvija.parikalpnaa.com/2011/05/blog-post_23.html
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