Thursday, April 16, 2009

कि तुम हो बहुत खुबसूरत !

कि तुम हो बहुत खुबसूरत
और दिलकश भी
मैंने आवाज में कभी नही कहा उसको
हालांकि
दुहराया होगा मन में लाखों बार

कि तुम्हारे मुस्कुराने से
हंसने लग जाती है मेरी दुनिया
और दिल
गुलमोहर के लाल टेस फूलों से भर जाता है
ऐसा भी मैंने कभी नही कहा आवाज में उसको
पर ये कोई बनावटी बात भी नही है

मैं सोंचता था
एक दिन वो समझ लेगी सारा हीं
मेरा कहा-अनकहा
और अपने कोमल रिश्ते की डोर से
मेरा सारा बिखराव समेट कर बाँध लेगी

मैं इंतेज़ार करता रहा
कि कब वो मेरे किताब खोल कर
उसकी नज्में
पढ़े
पर मैं यूँ हीं रह गया बिना पढ़ा

दरअसल,
जिंदगी को मायने देने के लिए
जो भी चीजे जरूरी थी
उसे इसी तरह मैं टालता गया

और मैं बेमायने हीं रह गया
आख़िर तक

9 comments:

Shikha Deepak said...

सुंदर अभिव्यक्ति।

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

अनिल कान्त : said...

kuchh apnapan sa laga is rachna mein ..........behad bhavpoorn

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

संध्या आर्य said...

komal our khubsurat bhawo se saji hai aapaki kavita ki har ek panktiyan............

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!

SWAPN said...

sunder rachna.

कंचन सिंह चौहान said...

JO MAN ME DOHARAYA BAAR BAAR, USE EK ADH BAAR ZUBNAN PAR BHI LANA CHAHIYE......!

Nazm behad khoobsurat...!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति

raj said...

zingko mayne dene ke liye jo bho cheez jaruri hai main ose talta gya....boht sunder..