Saturday, April 18, 2009

सोंचता हूँ !

सोंचता हूँ
जिद करुँ तुमसे कि
पास बैठो मेरे, बिल्कुल करीब
जहाँ से सुन सको मेरी
आती-जाती साँसों में
तुम्हारे लिए जागी हुई कशिश
और अगर ठीक समझो
रख सको अपनी नर्म साँस उस पर
थोडी देर के लिए भी

सोंचता हूँ
कभी वो मौका मिले कि
दिन भर कि भागदौड़ से जन्मी
तुम्हारे पैरों कि थकान में
अपनी लोडियों से
मुठ्ठी भर नींद भर दूँ
और
तुम्हारी अलसाई हुई सुबह को
अपनी गोद में लेकर सहला दूँ
ताकि वे तरों ताजा हो जाएँ

सोंचता हूँ
कभी पूडी तलने के लिए
किचेन में खड़ी तुम
आटा गूँथ रही हो जब
और तुम्हारे दोनों हाथ
उस आटे में उलझी हों
तब मैं पीछे से आकर
तुम्हें पकड़ लूँ और तुम्हारे गर्दन पर
एक भारी और गीला सा चुम्बन रख दूँ

और भी कई चीजें हैं जो मैं
सोंचता हूँ वक्त-वेवक्त
पर कमाल इस बात में है कि
जब भी मैं सोंचता रहता हूँ यह सब
तब चीजें होती भी रहती हैं साथ-साथ


5 comments:

Syed Akbar said...

सर, आपने तो मन के सारे तार छेड़ दिए.

गुजारिश है आपसे, क्या मैं ये कविता अपनी पत्नी को समर्पित कर सकता हूँ.

संध्या आर्य said...

अच्छा सोचते हो ............
जब भी मैं सोंचता रहता हूँ यह सब
तब चीजें होती भी रहती हैं साथ-साथ

और भी अच्छा है.........

SWAPN said...

wah, swapn ke sath haqeeqat, mubarak ho.

raj said...

aap ne jo bhi likha hai bohat mohhabbat hai usme...khuda ki den hai jisko naseeb ho jaye...kitna achha hai aap jo sochte hai wo hota bhi hai...

ओम आर्य said...

अच्छा लगा ये कि मेरी कविता पसंद आई और आपने उस अभिव्यक्ति को समझा है. सईद जी से मेरा कहना है कि वे जरूर अपनी पत्नी को ये कविता अर्पित करें अगर वे ऐसा करना चाहते हैं. मुझे संतोष होगा.