Saturday, May 29, 2010

रिश्ते भी देह बदलते हैं...

घर लौटता हूँ
तो तुम्हारी यादें,
उसकी बाहों में खो जाती हैं

वैसे तो मुझे याद है
कि नहीं रहती इस शहर में अब तुम
पर फिर भी
धडकनों को न जाने क्या शौक है
रुक जाने का अचानक से
और दिल भी बहाने बना लेता है कि
तुम जैसा कोई दिख गया था

उधर वो अक्सर पूछ लेती है
रात को क्यूँ चौंक गए थे तुम
यूँ क्यूँ लगता है

कि कभी-कभी तुम्हारी धडकनें रुक जाती हैं

दफ्तर से लौटते हुए
नजरें मुड जाती है तुम्हारे घर की तरफ
पर कई बार भूल भी जाता हूँ
जब घर के लिए देर हो रही होती है

कभी-कभी घर लौटने पे
घंटी बजाने से पहले हीं
जब खोल देती है दरवाजा वो
तब सोंचता हूँ
यह केवल इन्तिज़ार नहीं है
तुम्हारी आँखों में भी
वो जो पिघल जाता था मिलने पर मुझसे
मैंने ऐसा कभी नहीं सोंचा
कि वो केवल इंतज़ार था

तुम्हारे जाने के बाद
सब वही तो चला रही है
कितना कुछ तो बढ़ भी गया है

दरअसल
कई बार तुम्हें याद करता
उसकी बाहों में गया हूँ
और कई बार
उसकी बाहें तुम्हारी यादों में रही हैं

तभी तो लगता है
कि सिर्फ आत्म हीं नहीं
हमारे रिश्ते भी देह बदलते हें


******

21 comments:

दिलीप said...

waak umda soch aur badi hi kalatmak aur marmik kavita...

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतर...
अंत की उलटबासी अच्छी लगी...

nilesh mathur said...

बहुत ही सुन्दर रचना!
www.mathurnilesh.blogspot.com

M VERMA said...

धडकनों को न जाने क्या शौक है
रुक जाने का अचानक से
और दिल भी बहाने बना लेता है कि
तुम जैसा कोई दिख गया था
यह शायद धडकनों की साजिश है जो देखना चाहती है देख लेती है
सुन्दर रचना एहसासों और धडकनो के बिलकुल करीब

पलक said...

मेरे नए ब्‍लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्‍ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।

श्यामल सुमन said...

सिर्फ आत्मा ही नहीं
हमारे रिश्ते भी देह बदलते हैं

सत्य वचन ओम भाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

सुशीला पुरी said...

रिश्तों का रूपांतरण होता तो है पर प्रेम मे वह और ज्यादा सघन होता है और ज्यादा तरल होता है ।

Shekhar Kumawat said...

अरे वाह जी बहुत सुंदर जबाब नही

धन्यवाद

sangeeta swarup said...

सिर्फ आत्मा हीं नहीं
हमारे रिश्ते भी देह बदलते हें

भावों की असीम गहराई लिए हुए ...अच्छी रचना

अमिताभ मीत said...

सही है ओम भाई.... बहुत बढ़िया !!

Satya.... a vagrant said...

bata nahi sakta kyun. par padhte huye ajnyeya kee "do" yaad aa gayi. bahut sundar . riste sharir badalte hai.
eternal truth.
satya

राजकुमार सोनी said...

क्या बात है दोस्त।

वन्दना said...

waah.........kitna sach kaha hai...........sirf aatma hi nahi, rishtey bhi deh badalte hain.........bahut khoob,.

महफूज़ अली said...

आपने हर बार की तरह निःशब्द कर दिया....

ग़ज़ब....

sangeeta swarup said...

आपकी ( स्पर्श लौट आते हैं हथेली में )कविता चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर मंगलवार १.०६.२०१० के लिए ली गयी है ..
http://charchamanch.blogspot.com/

स्वाति said...

बढ़िया!!सुन्दर रचना!

sada said...

धडकनों को न जाने क्या शौक है
रुक जाने का अचानक से
और दिल भी बहाने बना लेता है कि
तुम जैसा कोई दिख गया था ।

गहरे भावों के साथ बेहतरीन शब्‍द रचना ।

dimple said...

दफ्तर से लौटते हुए
नजरें मुड जाती है तुम्हारे घर की तरफ
पर कई बार भूल भी जाता हूँ
जब घर के लिए देर हो रही होती है..कितने चित्र से खिंच जाते है आँखों के आगे.कैसे उठती होगी नज़र उस घर की तरफ हर बार गुजरने पे.कई यादो के समन्दर उमड़ आते होंगे.
दरअसल
कई बार तुम्हें याद करता
उसकी बाहों में गया हूँ
और कई बार
उसकी बाहें तुम्हारी यादों में रही हैं
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे

dimple said...

फिर किसी की याद का इक सिलसिला,
दर्द के सेहरा में ले आया मुझे.
कौन अब तक ढूंढ़ता होगा मुझे.

सन्ध्या आर्य said...

रिश्ते
जब गहरे हो जाते है
वह देह बदल लेते है शायद........

तेरी आंखो की वह सुर्ख रंग
तेरे रौशन चेहरे पर
मेरे गुलाबी इश्क की
दास्तान लिखती थी तब
यादो के नीला आसमान पर
चाँद की मानिंद
आज भी रौशन है
तेरी दोनो आंखे!

अपूर्व said...

कविता की मूल भावना बहुत यथार्थपरक है..डरा देने की हद तक..समय के आगे समर्पण कर अपना प्रारब्ध स्वीकार कर लेने के बावजूद अपनी ख्वाहिशों के ध्वंसावशेष अपनी मुट्ठियों मे कस कर दबाये रखने जैसा...
..कविता उस हृदय के आर्तनाद जैसी लगती है..जिसकी जमीं पर कुछ बंजारे खूबसूरत ख्वाबों ने कभी अपने डेरे डाले थे..और वक्त की आंधी मे उन खेमों को उखाड़ लिये जाने के बाद भी जैसे जमीं के सीने मे पड़े वो जख्म रह रह कर धड़क रहे हों अभी भी!!
..सब कुछ चलता रहता है..जिंदगी भी..बस एक कोई चीज जो खो गयी है..और जिसके बिना भी काम चल सकता है..चल रहा है..मगर उसका खोना भर इस घर का मुस्तकबिल बन गया है...और उसकी तलाश मे उम्र जाया करना जिंदगी का मुस्तकबिल..जबकि उसे भी मालूम है कि वह नही मिलेगी..मगर..!!
..और क्या कहूँ!