पिछला साल ख़त्म हुआ
और ये नया साल भी
अपनी रोजमर्रा की चाल से चलता हुआ
एक महीना और पांच दिन गुजार चुका है
और तमाम कोशिशों के बाबजूद
इस नए साल में
मैं प्यार नहीं कर पाया हूँ तुम्हें
दोष किसी भी चीज के मत्थे मढ़ दूं
पर हकीकत कुछ और है
और वो बहुत तेजी से बेचैन कर रहा है मुझे
और चौंकाता है कि
बिना प्यार के हीं चल रहा हूँ मैं आजकल
मुझे नहीं मालूम था
कि अचानक से ये खो जाएगा एक दिन
मृत्यु के पहले हीं
और मुझे केवल सांस के सहारे
छोड़ दिया जाएगा
तभी तो कभी जरूरत नहीं समझी जानने की
कि कहाँ से उगता है,
कैसा है इसका बीज और
किसने रोपा था इसे
और अब तो कहीं दीखता हीं नहीं ये
अब कहाँ पानी डालूँ, कहाँ दिखाऊं धूप
पतझड़ में नंगी शाखों की पीड़ा
अब बहुत घनी है मुझमें
बदन पर का सतही तनाव बढ़ता चला जाता है
दरारें उगती आती हैं
तुम तक पहुँचने की
और तुम्हारा ह्रदय छू लेने की उत्कंठा
उत्कट हुई जा रही है
मैं मर रहा हूँ
और जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि
तुम देख भी नहीं पा रही
तुम तक पहुँचने की मेरी जद्दोजहद
__________
Saturday, February 5, 2011
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11 comments:
.......और जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि
तुम देख भी नहीं पा रही
तुम तक पहुँचने की मेरी जद्दोजहद ....
विवषता को प्रतिबिम्बित करता सशक्त बिम्ब!वाह!
पतझड़ में नंगी शाखों की पीड़ा
अब बहुत घनी है मुझमें
बदन पर का सतही तनाव बढ़ता चला जाता है
दरारें उगती आती हैं
सही कहा ऐसा वक्त भी आता है जब पीडा इतनी सघन होती है कि दरारें पड ही जाती हैं और उसे पता भी नही होता …………सिर्फ़ समझ सकती हूँ उस पीडा को मगर यहाँ कुछ भी व्यक्त नही कर सकती क्योंकि शब्द खामोश हो गये हैं।
बहुत सच्चा प्यार.वो कौन अभागा है जो इस प्यार को समझ नही पाता ....!
कितनी कसमसाहट ..कितना द्वन्द ...बेहतरीन
उसे लगता
वह कही और है
पर खडी है वह
उसी इंतजार मे
जहाँ वह
छोड दी गई थी
उसके आंखो का प्रकाश
पहले से ही धुँधला था
वह नही देख पाता
अंतर्मन की सुक्ष्मता को
खलिश बेपनाह है
उन धागो की
जो उलझ गई है
वक्त के कांटो में
दर्द की स्थितियाँ
दो तरफा हो
बन गयी है नासूर
उसकी उंगलियो की
बेमौसमी ब्यारो से
टीस की आह तक
नही निकाल पाती
वह
क्योकि आवाज़
साधना मे खलल डालती है!!
बढ़ता जाता समय और न मिल पाने की निराशा।
विवषता को प्रतिबिम्बित करता सशक्त बिम्ब!वाह!
बहुत उम्दा… ओम जी !
"पतझड़ में नंगी शाखों की पीड़ा
अब बहुत घनी है मुझमें"…
बेहतरीन खयाल !
ओह ! लगा जैसे मेरी अपनी ही भावनाएँ हों.
प्रेम और विरह की बेहतरीन अभिव्यक्ति !
प्यार के बिना सिर्फ सांसो के सहारे छोड़ दिया जाना ..आपकी उस तक पहुंचने की जद्दोजहद..मर-मर जाने का अहसास..न जाने क्या है इन शब्दों में जो बेचैन कर जाता है...
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