Tuesday, February 8, 2011

रूह में नंगे जाना होता है...

मैं चलता गया था उसकी तरफ
निरंतर
दूरी कितनी तय हुई मालूम नही

रास्ते में मै कही ठहरा नही जिस्म पर
और वो भी
रूह से पहले तक
दिखायी नही दी एक बार भी

अचानक से हुआ कि छू लूं
जैसे ही दिखी पर
अदृश्य हो गयी हाथ बढाते ही
तब लगा मैं
लिबास साथ लिये आ गया था

लौटना पड़ा मुझे
रूह में नंगे जाना होता है...

_____________

14 comments:

Sonal Rastogi said...

निशब्द हूँ ,सच ही तो है रूह में नंगे
ही तो जाना होता है

kshama said...

Uf!Kis gahrayi me chale jate hain aap!

संजय भास्कर said...

वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

प्रवीण पाण्डेय said...

मनवा लाख करे चतुराई, पर अकेले में सब छूट जाती है।

GAJANAN RATHOD said...

बहुत खूब. रूह तक पहुचने नग्न चित्त ही तो चाहिए होता है.

संध्या आर्य said...

टुकडो मे बंटा
और फटा
हर जगह दिख जाता है
जामिर
पर क्या करे
वह नही फटता
क्षणभर को
जहाँ जमीन फटती है
आकाश गुंगा और
बहरा हो जाता
पर अश्क
अपने आकार में
गोल ही रहता
हरदफा !!

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (10/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

सागर said...

रूह में नंगे जाना होता है, और उसका बाद ? आना होता है की नहीं ?

अपूर्व said...

रूह का सफ़र इसी लिये मुश्किल हो जाता है...जिंदगी बस लिबासों की अदलाबदली का नाम होती है..ऐसी ही कोई नज़्म अमृता प्रीतम की भी याद आयी थी...सुंदर कविता..मगर कुछ जल्दी मे हैं आप आजकल..या मसरूफिअत..

संध्या आर्य said...

चुभती आशाओ के बीच
समय के पंख
उडान पर जा चुके थे
मूँह चिढाते हुये
मंजर में उमस
बरकरार

रातो ने सिख ली
सिसकियो
पर चलना
आंखो ने बरस बरस के
तन्हाईयो को भींगोना
दीवार पर उग
आयी थी सीलन
बेरुखियो की

खामोश स्पर्श उसे
खाता रहा घुँट-घुँट
तमाशबीन था रिश्ता
मायाठगनी बनी प्रबल-प्रवीण
छलती गयी उम्रभर
हवाओ का रुखापन
फेफडो को छलनी कर गयी

घडियाँ फंसी रहती
धमनियो मे
धुटन के लुका-छुपी से
डर हावी होता रहा
सवेरो पर
उसे लगता कोई
सुबह काला भी होगा
उसके आंखो का

सफर में मंजिल
बहुत दूर निकल गयी
ठीकाना भी अकेला पडा
करवटे बदलता रहा
लावारिश
सडको के किनारे

बेकल और
बेबस मन ने
छोड दिया
आना जाना
आवाजो के दर्मिया
धुंध घना
भूत का डेरा
चहुओर बना

आशाओ की टहनियो पर
खुशी ठुँठ
सफर इतना सा
सामान पूरे
खलिश बेशुमार !!

***Punam*** said...

tareef ke liye alfaaz hi nahi hai....
kai dino ki masrufiyat ke baad aapki sari nazmen padhin..
ruh se ruh ke milan ke liye samaaj ki sari poshakon ko (jinmen aadambar,irshya,dvesh,lobh,moh aadi bhi shaamil hain)utaar ke hi jaana hota hai.....bahut khoob aapki sari rachnaayen...!!

शिवकुमार ( शिवा) said...

सुंदर रचना ..
shiva12877.blogspot.com

: केवल राम : said...

अध्यात्मिक भाव संप्रेषित करती सार्थक प्रस्तुति

सुमन'मीत' said...

pahli baar aapke blog par aai hun...
bahut hi sundar.......great...