मकान पक्के होते गये
और दीवारे भी
पक्के और सख्त साथ- साथ
दर्द सुनने के लिए न कान रह सके खुले
और न दिल के कोशे उनके
बारीक से बारीक पोर भी
पाट दिए गये
गारे-चूने से
कंपकपाती निरीह कराहें
उन दीवारों के दोनों तरफ
किसी कोलाहल का हिस्सा ही लगती रहीं
आसुओं से भींग कर
ढह जाने वाली दीवारें
बची नहीं इन पक्की उंची इमारतों में
अब
ये पक्के मकानों, सख्त दीवारों और सूखे लोगों की सभ्यता है
जहाँ आंसू पिघलाते नहीं और चीख कोलाहल लगती है.
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Sunday, September 27, 2009
Wednesday, July 8, 2009
साकी.
तू किनारे पे करना इंतेज़ार साकी
मैं लौटूँगा फिर इस पार साकी
बिक जाएंगे एक दिन कौडियो में सब
तब भी बच जाएंगे ये बाजार साकी
अरसे से महरूम रखा आँसुओं से
आँखों का हूँ बड़ा मैं गुनहगार साकी
तेरे घर का दरवाजा हर दफ़ा बंद मिला
हम गुजरे तो तेरी गली से कई बार साकी
कह जाएंगे जिस रोज हम आखिरी अलविदा
रोएंगे फूट फूट ये दर-ओ-दीवार साकी
मैं लौटूँगा फिर इस पार साकी
बिक जाएंगे एक दिन कौडियो में सब
तब भी बच जाएंगे ये बाजार साकी
अरसे से महरूम रखा आँसुओं से
आँखों का हूँ बड़ा मैं गुनहगार साकी
तेरे घर का दरवाजा हर दफ़ा बंद मिला
हम गुजरे तो तेरी गली से कई बार साकी
कह जाएंगे जिस रोज हम आखिरी अलविदा
रोएंगे फूट फूट ये दर-ओ-दीवार साकी
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