Sunday, September 27, 2009

सूखे लोगों की सभ्यता

मकान पक्के होते गये
और दीवारे भी

पक्के और सख्त साथ- साथ

दर्द सुनने के लिए न कान रह सके खुले
और न दिल के कोशे उनके
बारीक से बारीक पोर भी
पाट दिए गये
गारे-चूने से

कंपकपाती निरीह कराहें
उन दीवारों के दोनों तरफ
किसी कोलाहल का हिस्सा ही लगती रहीं

आसुओं से भींग कर
ढह जाने वाली दीवारें
बची नहीं इन पक्की उंची इमारतों में

अब
ये पक्के मकानों, सख्त दीवारों और सूखे लोगों की सभ्यता है
जहाँ आंसू पिघलाते नहीं और चीख कोलाहल लगती है.

26 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

उँची और कठोर दीवारों को अब आँसू भिंगो सके बड़ा ही मुश्किल है.ओम जी बड़े ही बेहतरीन और अनोखे अंदाज में रचते है आप कविता
कभी कभी सोचना पड़ता है भाई कितना बड़ा सागर छुपा कर रखा है आपने भावनाओं का
बहुत सुंदर कविता..धन्यवाद..ओम जी..
और दशहरा की हार्दिक शुभकामना प्राप्त करें अपने छोटे भाई की ओर से..

अनिल कान्त : said...

आपकी रचना हमेशा कुछ ख़ास होती है

सागर said...

Om ji,

यह आपकी ही लिखी कविता का दूसरा भाग लगता है... कुछ महीने पहले शोर, आवाज़, और बंद कमरे पर एक और कविता टूटी-टूटी सी याद आ रही है आपकी...

योगेश स्वप्न said...

bahut khoob om ji, umda rachna. badhaai.

अल्पना वर्मा said...

'वक़्त की मार पड़ती है तो दीवारें रूप रंग बदल लेती हैं..बदले रिश्ते नाते ..संवेदना की हीनता....सब समय का फेर है'...गहन भाव लिए अच्छी कविता के लिए बधाई.

kshama said...

ऐसी अवस्था से तो बेहतर हो , दीवारें ढह जाएँ और हम नीचे दब जायें ...! उफ़ ! कितनी घुटन है आपकी रचना में ...

M VERMA said...

अब
ये पक्के मकानों, सख्त दीवारों और सूखे लोगों की सभ्यता है
जहाँ आंसू पिघलाते नहीं और चीख कोलाहल लगती है.
चीख और कोलाहल मे अंतर करने वाले कान ही कहाँ रहे. चीख तो अक्सर अट्टहासो मे दबा दिया जाता है.
बहुत सुन्दर

वन्दना said...

risthon ke prati dhahti samvednaon ko sahi chitrit kiya hai.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

आज रिश्तों के प्रति लोगों का जो रवैया है, जिस संस्कृति को हम अपनाते जा रहे हैं उस की बेहतरीन प्रस्तुति.

Mithilesh dubey said...

बहुत खुब ओम भाई, एक दम डूबकर लिखते हैं,

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भाई ओम ब्हुत सुंदर.

मीनू खरे said...

बहुत पीड़ा मे डूबकर लिखी गई कविता. बधाई.

sangeeta said...

अब
ये पक्के मकानों, सख्त दीवारों और सूखे लोगों की सभ्यता है
जहाँ आंसू पिघलाते नहीं और चीख कोलाहल लगती है.

marmsparshi rachna hai....sach hi aaj log sabhyata bhool chuke hain....bahut sundar abhivyakti...badhai

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओम भाई,
कलिकाल में पक्की और सख्त दीवारों के दोनों ओर की त्रासद दशा तथा मानवीय संवेदनाओं के विकट ह्रास को पूरी संजीदगी से अभिव्यक्त करती एक अनूठी कविता ! मन के तल पर इसकी गूँज लम्बे समय तक रहेगी. बधाई ! -

Babli said...

बहुत ही गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना बहुत अच्छी लगी! अत्यन्त सुंदर!

दिगम्बर नासवा said...

ये पक्के मकानों, सख्त दीवारों और सूखे लोगों की सभ्यता है
जहाँ आंसू पिघलाते नहीं और चीख कोलाहल लगती है

सच ......... बस एक यथार्त जो आपने इन पंक्तियों में उतार दिया है ओम जी ......... रिश्ते जिस रफ्तार से बदल रहे हैं दीवारें उतनी ही रफ़्तार से मजबूत होती जा रही हैं ........... आपने दुखती राग को पकडा है ........

संतोष कुमार सिंह said...

ब्लांग पर बने रहे इसी शुभकामनाओं के साथ दशहरा की जय हो।

Mumukshh Ki Rachanain said...

ये पक्के मकानों, सख्त दीवारों और सूखे लोगों की सभ्यता है
जहाँ आंसू पिघलाते नहीं और चीख कोलाहल लगती है

एकदम दुरुस्त, पर करें तो करें क्या...........नक्कारखानें में आवाज भी तो नहीं गूंजती....

एक बेहतरीन रचना को जन्म दिया है आपने बीत रही, महसूस हो रही त्रासदियों के बीच.

आपको हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

अवाम said...

sundar rachna hai apki..
Badhayi..

कुलवंत हैप्पी said...

हर पोस्ट की तरह ये भी उत्तम थी। और क्या कहूं। बहुत बहुत शानदार

चंदन कुमार झा said...

खूबसूरत रचना । बहुत सुन्दर । आभार ।

Apoorv said...

कंपकपाती निरीह कराहें
उन दीवारों के दोनों तरफ
किसी कोलाहल का हिस्सा ही लगती रहीं
ओम जी कहते हैं कि दीवारों के कान होते हैं..पता नही कि दिल होता है या नही..अगर होता तो कब की चिटक गयीं होतीं ये मजबूत दीवारें.
आपके मौन के घर मे एक वक्त के बाद इतना कोलाहल महसूस किया..आपकी ढेर सी कविताएं पढ़ने के बाद मैने यह महसूस किया कि आपका काव्यानुभूति का आकाश कितना विस्तृत और सुदीप्त है..आपकी मदर्स डे की पुराने बाशिंदे वाली कविता को मैं अपने आँकलन से आपकी सर्वष्रेष्ठ रचना मानता हूँ..सो प्रेम से इतर इन अन्य भावों को भी जब-तब शब्दों के पनाह मे लाते रहें..अद्भुत!!!

महफूज़ अली said...

आसुओं से भींग कर
ढह जाने वाली दीवारें
बची नहीं इन पक्की उंची इमारतों में

अब
ये पक्के मकानों, सख्त दीवारों और सूखे लोगों की सभ्यता है
जहाँ आंसू पिघलाते नहीं और चीख कोलाहल लगती है.


kitna sahi likha hai aapne yeh.....

rishte ajkal dhah gaye hain....

raj said...

bahut kuchh sochne pe majboor karti hai kavita..mkaan pakke ho rahe hai..diware bhi..fir bhi kuchh logo ko ab bhi diwaro se pyaar hota hai..unki sukh dukh ki sathi hoti hai...diwaro se milkar rona achha lagta hai...

Ravinder Verma said...

om ji aapka e-mail add chahiye.

कमलेश वर्मा said...

om ji e-mail add batao apna.