Saturday, September 5, 2009

अभी-अभी उसके ख्वाब से लौटी हूँ !!

आँख बढ़ा कर
खींच लिया उसने
नींद के उस तरफ मुझको,

आवाज़ जो आने को थी,
बुझा दिया उसको
लबों पे मेरे, उंगली रख के

फिर कुछ देर तक वो
संभालता रहा अपनी साँसे
और मैं अपनी

फिर हौले से
उठा दी उसने चेहरे से हया
और खोलने लगा गाँठे
एक के बाद एक,
जो अब तक
बंद पड़ी थी किसी संदुकची में

जमी हुई साँसें पिघल गयी
और जिस्म ने भी
सारे गुबार निकाल दिए, दबे हुए

ख्वाब के शरीर में तुम्हारे,
जाने कौन सा मौसम था
कि लौटी हूँ वहां से
तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है

30 comments:

Mithilesh dubey said...

वाह ओम जी बहुत खुब, अब तक की रचनाँओ मे आपकी ये रचना मुझे सबसे ज्याद पंसद आयी। लाजवाब

Nirmla Kapila said...

क्या कहूंम निशब्द हूँ शायद मिथिलेशजी ने सही कहा है अद्भुत सुन्दर रचना जैसे सभी एहसास इस एक रचना मे पिरो दिये हों बधाई

raj said...

kavita nahi mano ek khab tha...ek khoobsurat tilasmi khab...khabo ki duniya me le gya ye khab....khab jo sone na de...apki lajwab swapnil kavita.....amazing.....

सागर said...

आवाज़ जो आने को थी,
बुझा दिया उसको
लबों पे मेरे, उंगली रख के

... इसे ही कहते है शब्द की जादूगरी... वाह

आँख बढ़ा कर
खींच लिया उसने
नींद के उस तरफ मुझको

...और इसे कल्पना की उडान, सोच से परे


उठा दी उसने चेहरे से हया
और खोलने लगा गाँठे
.... अरमान - आह!

तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है
... चरमोत्कर्ष! क्लाइमेक्स !

... रामबाण निष्कर्ष! पञ्च लाइन गुरु!

mehek said...

ख्वाब के शरीर में तुम्हारे,
जाने कौन सा मौसम था
कि लौटी हूँ वहां से
तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है
waah bahut khubsurat

sada said...

बहुत ही लाजवाब एवं बेहतरीन रचना, बधाई

Atmaram Sharma said...

भई, बहुत बढ़िया. खासकर
आँख बढ़ा कर
खींच लिया उसने
नींद के उस तरफ मुझको

नीरज गोस्वामी said...

लाजवाब अनूठी रचना...बधाई...
नीरज

चंदन कुमार झा said...

कितनी सुन्दर अनुभूति ।

दिगम्बर नासवा said...

ख्वाब के शरीर में तुम्हारे,
जाने कौन सा मौसम था
कि लौटी हूँ वहां से
तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है

वाह ......... लाजवाब .......... गहरी बात ............. ओम जी कभी कभी सोचत हूँ इतने एहसास कैसे उतार देते हैं आप अपनी रचना में ............... लगता है जैसे सांस ले रहे हों आपके शब्द ............ और हमारे पास उस वक़्त शब्दों का टोटा पड़ जाता है .... मन बहुत कुछ कहना चाहता है पर कह नहीं पाता .........

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओम भाई,
बहुत शानदार-जानदार रचना ! भावनाओं के आकाश में शब्दों को जिस करीने और saleeke से आपने sajaya है आपने, वह padhte ही halchal machaa देता है. ये hunar और ये andaaze-bayan ba-kamaal है. आपकी kalam को salaam है ! sapreet...

दर्पण साह "दर्शन" said...

फिर कुछ देर तक वो
संभालता रहा अपनी साँसे
और मैं अपनी

raj ji ki maat meri bhi maan lijiye.

badhai itni badhiya rahcna ke liye.

रश्मि प्रभा... said...

nihshabd se ehsaas

kshama said...

नही पता कि , आपकी किस रचनाको 'बेहतरीन ' कहूँ ...! हर बार आप भी ' ख़ामोश' कर देते हैं !

अर्शिया said...

आपकी हर कल्पना लाजवाब होती है।
{ Treasurer-S, T }

Pankaj Mishra said...

वाह ओम भाई गजब की रचना !!

योगेश स्वप्न said...

wah om ji, gazal kya cheez hai is rachna ke saamne, bahut hi umda, anupam rachna , badhai.

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

आपकी रचनायें शाय्द जादू जानती हैं कि बड़ी ही सफाई से नज़रों के रास्ते दिल में उतर जाती हैं। शब्द जैसे कमाल करते हैं ;-

ख्वाब के शरीर में तुम्हारे,
जाने कौन सा मौसम था
कि लौटी हूँ वहां से
तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है

पढ़ने का लुत्फ आता है.....

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

वन्दना अवस्थी दुबे said...

केवल शानदार लिखती हूं तो रस्मादायगी लगती है, व्याख्या करना चाहती हूं तो शब्द कहीं गुम हो जाते हैं बस एक ही आवाज़ सुनाई देती है- लाजवाब.
आपने पम्पलेट बदल क्यों दिया? काले रंग पर अक्षर आंखों को तकलीफ़ देते हैं. पहले वाला तो बहुत अच्छा था.

vikram7 said...

आवाज़ जो आने को थी,
बुझा दिया उसको
लबों पे मेरे, उंगली रख के

फिर कुछ देर तक वो
संभालता रहा अपनी साँसे
और मैं अपनी
लाजवाब

Dr. Hari Nath Mishra said...

बहुत ही खुबसूरत रचना ओ़म जी।

Shilpa said...

Beautiful poem, as usual.

and new template looks nice...

Shilpa

Apoorv said...

बहुत खूब रहा आपका यह ख्वाबीदाँ मगर मौन वार्तालाप..बधाई है.

M VERMA said...

तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है
बेहद खूबसूरत रचना
पढने के बाद भी माथे की सारी सिलवटे मिट गयी.

संतोष कुमार सिंह said...

बहुत खुब रचनाओं के माध्यम से बिहार के सोये जमीर को जगाने का काम करे।हमलोग लगातार मिलते रहेगे।

Mrs. Asha Joglekar said...

Bahut sunder najm, khas kar badan par ek bhee silwat na rehane kee bat.

creativekona said...

Om Arya Ji,

main hoon to bahut adana sa insan ...lekin aisee tippaniyon ka kya matalab....lage raho ka matalab samjha den to badee kripa hpgee.

Hemant kumar

महफूज़ अली said...

ख्वाब के शरीर में तुम्हारे,
जाने कौन सा मौसम था
कि लौटी हूँ वहां से
तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है


Om ji.......... ky alines likhu hain aapne........

aapki kalpnasheelta ka bhi jawab nahin.........

Babli said...

बहुत सुंदर और अद्भूत रचना! आपकी लेखनी को सलाम! आपकी रचनाओं की जितनी भी तारीफ की जाए कम है!

vandana said...

ख्वाब के शरीर में तुम्हारे,
जाने कौन सा मौसम था
कि लौटी हूँ वहां से
तो बदन पे एक भी सिलवट नहीं है

kya kahun...........nishabd ho gayi padhkar.........na jaane kya chupa hai is rachna mein..........dil ko choo gayi