Tuesday, September 15, 2009

तेरे माहौल में रहा करता हूँ !!

अक्सर चला जाता हूँ
अपने किनारे से चलते हुए
तुम्हारे मंझधार तक
अनजाने हीं तुम्हारे बहाव में बहते हुए

खाली कर के रखता हूँ
हमेशा कुछ स्थितियां
ताकि तुम आओ तो
कुछ भर सको उनमें अपनी पसंद का

तुम्हारी ताप में जाकर
स्थिर हो रहना
मुझे देता है
खुद को कायम रखने की ऊर्जा
और तुम्हारे ख्वाब में जाकर हीं
पूरी होती है मेरी नींद

मध्धम से तेज
हर तरह की धुप में
तुम्हारा रूप भरता रहता है
मेरे बदन के कोशे कोशे को

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको

दरअसल
तेरे माहौल में होना हीं
सही मायने में मेरा होना है

39 comments:

mehek said...

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको
dil ke jazbaaton ko sahi roop mein mayane deti khubsurat kavita waah

Nirmla Kapila said...

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको
om
जी एक बार फिर से लाजवाब रचना भावनाओं मे बहते हुये शब्द बहुत कुछ् कह जाते हैं बहुत बहुत बधाई

विनोद कुमार पांडेय said...

किसी के माहौल में खो जाने का कितना बेहतर तरीका समझाया आपने अपने कविता के माध्यम से..किसी के प्रति अद्भुत प्रेम व्यक्त करती यह कविता दिल को छूती है..मैं बधाई अब नही कहूँगा आप सुंदर लिखते ही हो..बस हम पढ़ने का मौका देते रहिए सुंदर और सुंदर ..
धन्यवाद....ओम जी.....बेहतरीन अभिव्यक्ति..

raj said...

tere mahool me hona hi sahi mayne me hona hai......har kadam pe udhar mudh ke dekha uski mahfil se hum uthh to aaye....hmesha ki tarah awesome..

दिगम्बर नासवा said...

दरअसल
तेरे माहौल में होना हीं
सही मायने में होना है..........

वाह ....... ओम जी क्या ख्याल है ... नींद का पूरा होना उनके ख्यालों में जा कर .......... अपने होने का एहसास भी उनके होने पर .......... लाजवाब लिखा है ............ दिल में उतर गया सीधे से

नीरज गोस्वामी said...

सुन्दर शब्दों से सजी इस भावपूर्ण रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नीरज

मीनू खरे said...

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको

लाजवाब रचना.

Mithilesh dubey said...

लाजवाब अभिव्यक्ति बहुत खुब। शानदार रचना। बहुत-बहुत बधाई

Pankaj Mishra said...

sundar!!!! saras!!! mithut!!!

संगीता पुरी said...

कमाल की रचना है .. बहुत बहुत बधाई !!

kshama said...

खुशनसीब होगी वो जिसके माहौल में रहते हैं...हमेशाकी तरह एक ज़बदस्त बहाव में बहाने वाली रचना...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुन्दर लिखा है आपने ..अच्छा लगा पढ़ना

रश्मि प्रभा... said...

utkrisht bhawnayen

अनिल कान्त : said...

आप दिल के जज्बात को बखूबी पेश कर लेते हैं...काबिले तारीफ

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

कायम रहे माहौल, मैं बस इतनी दुआ करता हूं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

vandana said...

khoobsoorat khyalon se saji ek bhavbhini rachna..........dil mein gahre tak utar gayi...........badhayi

अर्शिया said...

गजब का समर्पण।
{ Treasurer-S, T }

'अदा' said...

दरअसल
तेरे माहौल में होना हीं
सही मायने में होना है
behad khoobsurat zajbaat hain..

मध्धम से तेज
हर तरह की धुप में
तुम्हारा रूप भरता रहता है
मेरे बदन के कोशे कोशे को
prem ki abhivyakti kashish liye hue..
sundar..

चंदन कुमार झा said...

बहुत सुन्दर रचना है…………शुभकामनायें ।

awaz do humko said...

behtareen...bahut dino baad aap ke blog par aaya hoon iske liye maafi

विपिन बिहारी गोयल said...

दरअसल
तेरे माहौल में होना हीं
सही मायने में होना है

सही कहा आपने ....बहुत सुंदर भाव

डॉ .अनुराग said...

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको







आखिरी की पंक्तिया बेमिसाल है .ओर कविता को उसका अर्थ देती है ...आपको पढना खुशगवार होता है हमेशा.....

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन... वाह..

शोभना चौरे said...

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको

bahut khubsurt jjbat .
abhar

दर्पण साह "दर्शन" said...

wah nazm ki antim line ne sama baandh diya,,,

दरअसल
तेरे माहौल में होना हीं
सही मायने में मेरा होना है


om saab ye cheez hi aisi hai...

gulzaar saab ki ek nazm yaad aa rahi hai....

..us wakat ...
tu kahan thi?
main kahan tha?

वाणी गीत said...

तेरे माहौल में होना ही मेरा होना है ...प्रेम में समर्पण की अद्भुत मिसाल पेश करती आपकी अनुपम कविता के लिए आभार ..!!

विवेक said...

कहीं बहुत गहरे से निकालकर लाते हैं आप जज़्बात को...और पढ़नेवाले को उसी गहराई में छोड़ आते हैं, जज़्बात की उथलपुथल के बीच।

Kusum Thakur said...

"जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको"
बहुत ही अच्छी रचना है . आपको बहुत बहुत बधाई.

sada said...

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको"

बहुत ही गहरे शब्‍दों के साथ सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

renu said...

किसी का साथ जिन्दगी भी दे सकता है ...भले ही उसके लिए मझधार में क्यूँ न जाना पड़े

शरद कोकास said...

बढ़िया है भई ओम ।

योगेश स्वप्न said...

bhai om ji, khubsurat khayalaat ko, bahut hi khubsurti se kavita ka bana pahnate ho. badhai.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

और तुम्हारे ख्वाब में जाकर हीं
पूरी होती है मेरी नींद
लाजवाब.

अर्चना तिवारी said...

बहुत ही सुंदर...दिल को छूने वाली

अमिताभ मीत said...

क्या बात है भाई ... आप का जवाब नहीं ! मैं जिन जिन का दीवाना हूँ .. वो सब कहते हैं कि आप को पढूँ तो कुछ सीखने को मिले ....

ये कविता बेमिसाल है .... बेमिसाल.

Apoorv said...

ओम साहब थोड़ा देर से पढ़ पाया इस बार आपको..और क्या कहूँ..शब्दों के लब भी सिल से गये रचना पढ़ कर...बस यह कहूंगा कि आपका कम्पेटीशन बस खुद से है..और खुद को ही आप क्या खूब मात दे देते हो आप..हर बार!!!
बधाई..

ओम आर्य said...

मीत भाई, ये कुछ ज्यादा नहीं हो गया !!!!!!!!!!

lovely said...

achhi kavita

Dr. Amarjeet Kaunke said...

जब कभी रात
अपने खालीपन में
लडखडाती हुई गिर जाती है
सुबह उठ कर पाता हूँ
तेरी ही जमीन को
नीचे से थामे हुए उसको

kudrat ka maanvikaran kitni khubsurti se kar dia nirsandeh aap ki yah kavita ati uttam kavita hai....