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Monday, September 13, 2010

हम चाहते हैं कि समंदर हो जाएँ !

हम पिघल गए थे
पर इतना नहीं कि समंदर हो सकें

हम चाहते थे कि समंदर हो जाएँ
और खोदते जाते थे
गहरा करते जाते थे अपना सीना
पर कवितायें तब भी
रह जा रही थीं अधूरी

हमारे चारो तरफ अभी भी बर्फ थी
जिन्हें पिघलना था
ताकि कवितायें आर-पार जा सकें और
हमें अभी भी सीखना था
नौ महीने पेट में रखने का सब्र
और सब्र की असुविधा भी
ताकि कवितायेँ पूरी जन्में

दरअसल
हमें अपनी बूंद का बाँध
बार-बार तोडना था
ताकि हम भी हो सकें समंदर
और हमारे किनारे बस सकें दुखों के नगर...

________

Thursday, October 29, 2009

हमने कई बार देखा है समंदर कों नम होते हुए !

लोग किनारे की रेत पे
जो अपने दर्द छोड़ देते है
वो समेटता रहता है
अपनी लहरें फैला-फैला कर
हमने कई बार देखा है समंदर कों नम होते हुए

जब भी कोई उदास हो कर
आ जाता है उसके करीब
वो अपनी लहरें खोल देता है
और खींच कर भींच लेता है अपने विशाल आगोश में
ताकि जज्ब कर सके आदमी के भीतर का
तमाम उफान

कभी जब मैं रोना चाहता था
पर आंसू पास नहीं होते थे
तो उसने आँखों कों आंसू दिए थे
और घंटों तक
अपने किनारे का कन्धा दिया था

मैं चाहता था
कि खींच लाऊं समंदर कों अपने शहर तक
पर मैं जानता हूँ
महानगर में दर्द ज्यादा होते हैं ...

और समंदर की जरूरत ज्यादा !!!

Sunday, June 14, 2009

उसने भी किनारे कर दिया मुझको !

उफनते समंदर में
डाल दिया ख़ुद को

उसकी आगोश में
गहरे डूबने के लिए

उसके पानी में
हमेशा कुछ छलकता दीखता था
मुझे लबालब करने को आतुर

सो उसकी अथाह उफनते पानीदार आगोश में
सरक गया मैं

पर उसने भी बहा कर
किनारे कर दिया मुझको