Friday, December 12, 2008

कल रात


रात का काफी बडा हिस्सा
नूर की आगोश में जागता रहा

समंदर साहिल पे आकर
चहलकदमी करता रहा

ख्वाब बिजली के खंभों के नीचे
बैठे ऊंघते रहे

हर तरफ से वक़्त फिसल कर
गिरती रही तन्हाई के अंधे कुँए में

मौन अपने हद तक चीख कर
बेअवाज हो गयी आखिरकार

नींद नहीं आई कल रात भी
कल रात तुमने फिर परेशां किया

बहुत तकलीफ दी तुमने कल
तुम्हारी हूक
कल रात फिर
फंस गयी थी सीने में .

3 comments:

नीरज गोस्वामी said...

समंदर साहिल पे आकर
चहलकदमी करता रहा
ख्वाब बिजली के खंभों के नीचे
बैठे ऊंघते रहे
बहुत कमाल के शब्द और भाव...भाई वाह...
नीरज

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हर तरफ से वक़्त फिसल कर
गिरती रही तन्हाई के अंधे कुँए में

मौन अपने हद तक चीख कर
बेअवाज हो गयी आखिरकार

बहुत खूब लिखा आपने

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया लिखा है।

हर तरफ से वक़्त फिसल कर
गिरती रही तन्हाई के अंधे कुँए में

मौन अपने हद तक चीख कर
बेअवाज हो गयी आखिरकार