Sunday, March 8, 2009

बाहें खोलो परमात्मा !

मैं चाहता हूँ
कि मेरा बहाव हो
तुम्हारे सागर की तरफ़
उमड़ता-उफनता
बदहवास भागता
तीव्र आवेग और प्यास से भरा
दौड़ा चला जाता हो मेरा पानी
तुम्हारे अथाह्पन में समां जाने के लिए

ऐसा हो कि
तुम्हारी गहराई में गहरे उतर कर
तेरी लय ताल में बहते हुए
मेर सारे किनारे टूट जाएँ
और मुश्किल हो जाए
मेरे लिए अपना स्वयं बचाना

मैं चाहता हूँ
मैं तुझमें अवस्थित हो जाऊं
और मेरा चाहना तुम्हारा चाहना हो जाए

तुम अपनी देह में मुझे
जगह तो दोगे न परमात्मा
मैं आता हूँ
अपनी बाहें खोले रखना !

3 comments:

vandana said...

ISI ANUBHUTI KE LIYE TO JEEVAN MILA HAI AUR ISI KO HUM BHOOLE BAITHE HAIN.
KASH AISA HO JAYE...PHIR TO KOI CHAH NA RAHE.
AATMTATVA KO PANA ITNA AASAN KAHAN,NA JAANE KITNE JANAM VYARTH CHALE GAYE AUR PATA NHI KITNE AUR JAAANE HAIN.....EK KOSHISH HAMEIN IS JANAM MEIN BHI KAR LENI CHAHIYE.
BAHUT BADHIYA.

vandana said...

OM JI
AAP BAHUT DINO SE MERE BLOG PAR NHI AAYE ,WAQT MILE TO AAIYEGA.

संध्या आर्य said...

aatma ka parmatma ke liye yah chahat bahut khub ..........