Saturday, March 21, 2009

लटों वाली लड़कियां !

खिड़कियाँ थीं
और उनपे परदे थे और
परदे सिर्फ़ इसलिए नही थे कि
खिड़कियाँ थी
बल्कि इसलिए कि उन खिड़कियों के उस तरफ़
जवान होती हुईं कुछ
लटों वाली लड़कियां थीं

इन लटों वाली लड़कियों के फिराक में
हम आते-जाते
खिड़कियों की तरफ़ झांकते -ताकते
कभी कभी उनमें से कुछ लड़कियां
लटों को हटाती हुई हमारी ओर भी ताकतीं
और फ़िर हम इस फिराक में
और आने जाने लगते

हमारा आना -जाना जब कुछ ज्यादा हीं बढ़ जाता तो
ये लटों वाली लड़कियां
मुस्कुरातीं हुई परदे खींच देतीं
और हमारी पतंगें बहुत ऊंची उड़ने लगतीं आसमान में।

ख्यालों में हम
अक्सर मुस्कुराते, गाते-बतियाते
उन खिड़कियों के पार जाके

एन वक्त पे
हम उन रास्तों पे,
बेवजह हीं निकल पड़ते
अपने-अपने साइकिलों पे होके सवार
जहाँ से उनके गुजरने की होती गुंजाइश

शाम के साथ
ये लटों वाली लड़कियां
जब उतर आतीं अपनी छतों पर
आस पास के अपने ठिकानो पे
हम बिना नागा किए खड़े मिलते
अपने अपने आकाशों पे अपना चाँद टांकते हुए

ढूंढते रहते हम
उनके चेहरों पे
प्यार से भरी आँखें
और आंखों में भरा प्यार
उन दिनों हम बहुत करते प्यार

हममें से ज्यादातर
नही जानते कि
कहाँ गयीं वो लड़कियां लटों वाली
किनसे प्यार किया उन्होंने आखिरकार
और वो कितना प्यार की गयीं
पर अंदेशा है कि
जिनको प्यार किया उन्होंने आखिरकार
वे हमारी तरह हीं
किसी और जगह और समय में
किन्हीं और हीं लटों वाली लड़कियों पे
लुटा चुके थे अपना प्यार.

21 comments:

संध्या आर्य said...

badhiya hai our kya kahe

Parul said...

badhiya hai..sach hai to bhi..kalpana hai to bhi..

अनिल कान्त : said...

किशोरावस्था की एक ये भी कहानी है

संदीप शर्मा Sandeep sharma said...

bahut khubsurat rachna hai...

Anonymous said...

पर अंदेशा है कि
जिनको प्यार किया उन्होंने आखिरकार
वे हमारी तरह हीं
किसी और जगह और समय में
किन्हीं और हीं लटों वाली लड़कियों पे
लुटा चुके थे अपना प्यार.........कौन थे?

बता सकते है.....वैसे आपको धर्म संकट मे नही डालना चाहते.

ओम आर्य said...
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ओम आर्य said...

ये वो लोग थे, जिनसे वे लटों वाली लड़कियां ब्याही गयीं और जिनको प्यार करना उनका हक़ था और उनसे पाना भी. पर वे लोग, जैसा कि मैंने कहा की अपना प्यार लुटा चुके थे.
मुझे सिर्फ ये नहीं पता कि बावजूद इन लोगों ने उन लटों वाली लड़कियों को प्यार किया या नहीं.

दरअसल ये कविता उन लटों वाली लड़कियों के लिए है जिन्हें न तो हमने (बहुवचन) प्यार किया और न उन लोगों ने. वे विना प्यार के हीं जीती हैं.

कविता में जहाँ भी 'हम' के इस्तेमाल हुआ है वो बहुवचन में हीं है

हौसला बढ़ने के लिए शुक्रिया आप सब लोगों का!!!

संध्या आर्य said...

आपने अपनी कविता की भाव से जिस तरह से रुबरु करवाया इसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद

Harkirat Haqeer said...

पर अंदेशा है कि
जिनको प्यार किया उन्होंने आखिरकार
वे हमारी तरह हीं
किसी और जगह और समय में
किन्हीं और हीं लटों वाली लड़कियों पे
लुटा चुके थे अपना प्यार.

Waah bhot gahri bat kah di aapne sacchai ko chuti hui....bhot khoob....!!

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

ढेरों बधाईयाँ एक अच्छी रचना के लिये जो खींच के ले जाती है उन शामों में जब पतंग के उतरने का इंतजार में की जाने वाली नजरे/पेंच बाजी जिन्दगी एक अदद हिस्सा होती थी.

मुकेश कुमार तिवारी

कंचन सिंह चौहान said...

har tarah se badhiya hi hoti hai aap ki rachanaen

SWAPN said...

khoj karo bhai, discovery chaanel walon se kaho. , om ji badhia likha hai. badhai.

anitakumar said...

:) badhiya prastuti...ghar ghar ki yahi kahaani, isi se chalti hai zindgaani

mritunjay said...

kavita achi hia ..

per what happend at end is not mentioned...?

After Wasting our useful time behind latwalli Ladikya ke peche,,
I ADD SOME MY LINES:

" LATEWALLI LADKIYE KE PECHE HUM OH GAYE BARBAD..
SAB KUTCH KHOYA,
KHOYA GHER PARIWAR KA PYAAR,
KHOYA APNA ZINDAGI BANANE KA WAQT, YE LATEWALLI LADKIYA ..YE LATEWALLI LADKIYA...

KUTCH NAHI MIL SIRF KARTE RAHE APNA TIME PASS....

kumar said...

Tathakathit sanskaar ke sakht pehron me jawani bita chuke log bhi is kavita men kishorvay ki tees mehsoos karenge........

sanjeev Kumar said...
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Sanjeev Kumar Verma said...

जिंदगी के स्लाइडर को घडी के माउस से ड्रैग करके यह कविता न जाने कहाँ ले गयी वाह ! वाह ! वाह!

Devmani said...

'लटों वाली लड़कियां' बहुत अच्छी कविता है । दरअसल छोटे शहरों के वे संवेदनशील लोग
जिनके दिलों में मोहब्बत और आवारगी का जज़्बा है, हुस्न की तारीफ़ का सलीक़ा है और
जिन्होंने अपनी छतों पर सर्दियों में धूप का लुत्फ़ उठाया है वही इसकी ख़ूबसूरती और त्रासदी
को समझ सकते हैं । मेरे भीतर भी वो एहसास अभी तक ज़िंदा है । एक ग़ज़ल में मैने उन
दिनों को याद करने की कोशिश की थी -

उदासी के मंज़र मकानों में हैं
कि रंगीनियां अब दुकानो में हैं

मोहब्बत को मौसम ने आवाज़ दी
दिलों की पतंगें उड़ानों में हैं

इन्हें अपने अंजाम का डर नहीं
कई चाहतें इम्तहानों में हैं

न जाने किसे और छलनी करेंगें
कई तीर उनकी कमानों में हैं

दिलों की जुदाई के नग़्मे सभी
अधूरी पड़ी दास्तानों में हैं

बहरहाल इतनी सुंदर कविता से रूबरू कराने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया । रचनाकार को हार्दिक बधाई ।

रवीन्द्र प्रभात said...

संवेदनाएं गहरी हैं और अभिव्यक्ति सुन्दर, बधाईयाँ!

विनोद पाराशर said...

आपकी "लटों वाली लडकिय़ां!" देखकर
फिर से कुछ-कुछ होने लगा.पुरानी यादें
-फिर से ताजा हो गय़ीं.किशोरावस्था में लिखी गई एक कविता
की कुछ पंक्तियां-
’वो तेरा रूक-रूक कर चलना
उसपर वो मदहोश हंसी
वो तेरे नॆयनो की हरकत
उसपर गालों की सुर्खी’
वो तेरा रूक-रुक कर चलना
उसपर बजना पायल का
क्या बतलाये ऎ मेर्र दिलबर
हाल हुआ,क्या घायल का
मॆं भी घायल,दिल भी घायल
घायल सब-कुछ हो गया
दुनियादारी को छोड दिया
मॆं तेरा कायल हो गया.

sanjay said...

बहुत खूब .क्या बात है. पढ कर मजा आ गया. आपकी कविताये मन को स्पर्श करती है