Thursday, March 12, 2009

गुस्ताखी माफ़ !

कुछ लोग (http://pratyaksha.blogspot.com/2009/02/blog-post_25.html) ऐसी रचनाएं प्रस्तुत करते हैं जिसे पढ़ कर ये महसूस होता है कि आज तक का सब पढ़ लिखा बेकार हो गया। किसी काम के न रहें. अरे यार, जब समझने के काबिल नहीं हो तो लिखोगे क्या-खाक? या तो लिखने वाले ही भंग खा के लिखते हैं या फिर पढने वाले को पढने से पहले नशा आ जाता होगा. या ये भी हो सकता है कि इस तरह की चर्चा में आने के लिए कि फलां का ब्लॉग तो समझ में हिन् नहीं आता, कुछ लोग कारगुजारी करते रहते हैं. मुझे तो लगता है लिखने वाले को भी समझ में आता है या नहीं. भाई मैं तो जयपुर में रहता हूँ और गुडगाँव जाने का किराया कभी भी झेल सकता हूँ अगर सामने वाला समझाने के लिए तैयार हो. हालांकि, सामने वाला ये भी कह सकता है कि आखिर दुनिया में और भी ब्लॉग्स हैं, तू इसके पीछे क्यूँ पड़ा है. तो भाई ये बता दूं कि पीछे पड़ने की अपनी आदत नहीं है पर इस बार न जाने कैसे रहा न गया. क्या आप बता सकते हैं कि क्यूँ न रहा गया?

नीचे उस रचना का चीड़-फाड़, जिसका जिक्र ऊपर है

कैसी आवाज़ थी ? (आप पूछ रहीं हैं या बता रही हैं?) जैसे किसी तूफान में समन्दर हरहराता हो , जैसे रेत का बवंडर गले से उठता था । उसमें पत्थरों की खराश थी , नमी थी एक खुरदुरापन था (यहाँ पे ये समझ नहीं आया कि नमी और खुरदुरापन को एक साथ क्यों लाया गया है )। रात में खुले में चित्त लेटे तारों को देखना था और किसी ऐसे ज़मीन के टुकड़े पर पाँव रखना था जो इस दुनिया का नहीं था (किसको-?)। जैसे छाती में कोई तार अटका कर खींच ले गया हो , वहाँ जहाँ अँधेरे में छिटपुट जुगनू सी रौशनी थी , फुसफुसाहटों की दुनिया थी और बहुत कुछ था , न समझने वाला (या न समझ में आने वाला? )बहुत कुछ । शायद उस बच्चे की भौंचक रुलाई सा जिसे ये नहीं पता कि उस बड़े ने क्यों उसे एक थप्पड़ मार दिया । सपने की रुलाई , गालों पर नमी छू (या छोड़?) जाती है । सपने और हकीकत के कैसे (इस 'कैसे' को मिटा दें क्या ?)तकलीफदेह झूलों पर झुलाती , उसकी आवाज़ । बीहड़ गुफा में अँधेरे को छूती आवाज़ जिसके सुरों पर ॥किसी एक टिम्बर पर रौशनी की चमकती किरण सवार हो , आँखों में चमक गया धूप का टुकड़ा , आवाज़ , जिसके सब रेशे बिखरते हों ..(?)
थक गया इतने में हीं, अब और नही होता ...

5 comments:

नीरज गोस्वामी said...

ह्म्म्म्म....बहुत मेहनत की है आपने पोस्ट पढने में...
नीरज

cmpershad said...

वाह भैया! अच्छा बहाना है किसी की कविता पढवा देने का:)

संध्या आर्य said...

Cmpershad ji
आप शायद गलत समझ रहे है गुस्ताखी माफ मे साफ लिखा है कि इस लेख का कोई मतलब समझा दे.खैर यदि आप लेख का मतलब समझ गये हो तो लेख का अर्थ समझाने का जहमत करें.

मुझे भी नही समझ मे नही आया कि pratyaksha ji
क्या अभिव्यक्त करना चाह्ती है. कई तरह से समझने की कोशिश करी पर हर बार असफल रही पर कोई तो उनकी इस अभिव्यति को समझा होगा.

SWAPN said...

yah modern art ki tarah modern kavita hai, aajkal ke gaane jinka na sir hota hai na pair, bade shan se sunte hain are usne jaisa bhi likha hai agar aapko pasand nahin to mat padho. uski himmat to na todo. ye mere vichar hain, jo kisi ke virudh nahin.

Bahadur Patel said...

prtyksha ji hamare samay ki bahut achchhi kahanikar hai.
unhone jo likha hai un bhavon ko gahrai se samjhana padhega.

is tarah ki chhichhaledar thik nahin lagati hain.