Friday, August 20, 2010

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो

वे टूटें
भूकंप के मकानों की तरह
और फटें
बादलों की तरह
हम कहीं दूर सूखे में बैठ कर
देखें उनका टूटना और फटना
लिखे उनके दुख और खुश होवें

टूट पड़ें सड़क पे
लाल बत्ती के हरी होते हीं
और बाजू में
बच कर निकलने के लिए संघर्ष करते
साइकिल वाले की साँसों का
उथल-पुथल देखते हुए
पार कर जाएँ सफ़र

रात की तेज बारिश में
बह गयी हों सारी यादें
तब भी सुबह उठ कर हम टाल जाएँ
खुद से बातें करना
और समय पे पहुँच जाएँ दफ्तर

दाल सौ रुपये किलो जाए
तो उसके साथ हम बेंच दे
अपनी मासूमियत

वो जलाएं हमें
और हम खींचें कश
मनहूस वक्त के छल्ले हर तरफ घूमते हों

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो
और हमारा क्या
हमारे दिमागों में पतझड़ का मौसम हो
और वहां पहुँचने वाली नसें सूखी.
____

15 comments:

kshama said...

Aapki rachnayen dilo-dimmag me bhookamp aur hadkamp dono macha deteen hain!

Sonal Rastogi said...

आस पास की परिस्थितियों की वेदना दिखती है आपकी इन पंक्तियों में...

महफूज़ अली said...

सच में आपकी रचनाएँ तो दिल को छू लेती हैं...

सुशीला पुरी said...

उफ !त्रासदी का अंत नही न !

संध्या आर्य said...

उसने पिलाई थी
एक घूँट नशा
जिंदगी का

ये लत है
मर्ज नही
जिंदगी की

यह सुखती दरिया
उफनती नही
जिन्दगी का

श्रापित है इश्क
बंजर सी
जिंदगी का !

अनामिका की सदायें ...... said...

कुछ आस पास की परिस्थितयो को सुंदर शब्दों का रूप दे अच्छी रचना बन पड़ी है. बधाई

रानीविशाल said...

Behad khubsurat aur gahari abhivyakti..pad kar accha laga!
Dhanywad
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

फणि राज मणि चन्दन said...

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो
और हमारा क्या
हमारे दिमागों में पतझड़ का मौसम हो
और वहां पहुँचने वाली नसें सूखी.

dil ko chhu kar bahut kuchh kah jaane waali rachnaa hai

Regards

वन्दना said...

हमेशा की तरह दिल को छू जाने वाली शानदार रचना।

अजय कुमार said...

हमेशा की तरह सुंदर , सार्थक रचना ।

Mithilesh dubey said...

बहुत ही सुन्‍दर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत संवेदनशील रचना

गौतम राजरिशी said...

आज बड़े दिनों बाद आ पाया हूँ अपने प्रिय कवि के द्वारे...ढ़ेर सारी पुरानी स्मृतियाँ समे्टते हुये।

सिरहाने में से आधा चाहिये ने फिर-फिर से दीवाना बनाया...

कैसे हैं आप?

vikram7 said...

अब और बंजर होने की जगह नहीं हो
और हमारा क्या
हमारे दिमागों में पतझड़ का मौसम हो
और वहां पहुँचने वाली नसें सूखी.
ati sundar,aary jii

Parul said...

om ji..vakai soch ke banjar hone ki ginjaish hi nahi..awesome!