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Sunday, May 23, 2010

स्पर्श लौट आते हैं हथेली में

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आजकल न कविता है
न प्रेम है
और न प्रेम कवितायें

सिर्फ भेदती हुई एक खामोशी है
जो शाम के
धुंधले प्रकाश के मर जाने के बाद भी
चिलचिलाती रहती है
और एक कई रातों से नहीं सोया एकांत है
जिसमें तुम्हें कहीं न पाकर
स्पर्श लौट आते हैं हथेली में
और बिस्तर पे देर तक आवारागर्दी करते हैं

सांस में इस तरह सन्नाटा है
जैसे आवाज और जीवन दोनों हीं
मृत्यु के नोंक पे ठहरे हों

एक हफ्ते से
अखबार में रोज तस्वीर के साथ
मेरे गुम होने की सूचना छपती है
और सुबह जब मैं दफ्तर के लिए ट्रेन पकड़ता हूँ
तो लोग कहते हैं
मैं क्यूँ कुरते पाजामे में घर से निकल आया था
और घर नहीं लौटता

मैं चुप रहता हूँ
और मन हीं मन उनको बताता हूँ कि
प्रेम बिना सब मृत्यु है
और फिर वे सब

सहमति में सिर हिलाते हैं

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Sunday, April 4, 2010

तुम पढ़ सको और हो सको बर्बाद

मैं तुम्हें हमेशा याद रखना चाहता था
इस तरह कि
तुम्हारे बारे में सोंचते हुए
मैं चबा जाऊं अपने नाख़ून
और मुझे दर्द का एहसास तक न हो

मैं चाहता था
कि तुम मेरी जिन्दगी का
सबसे बड़ा दर्द बन कर रहो,
एक घाव बन कर
जिसमें से हमेशा मवाद निकले
ताकि तुम्हें बेवफा कहने की जरूरत न पड़े

पर मेरे साथ ऐसा हुआ है कि
चीजें हमेशा मेरे चाहने के विपरीत हुईं हैं
जैसे चली गयी थी तुम एक दिन मेरे चाहने को दरकिनार करके
वैसे हीं तुम भुला दी गयी हो
मेरे ना चाहने के बावजूद

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तुम्हें भुला दिया है
और यह अपने आप में काफी है
दिल को सुकून और
जिस्म को ठंढी सांस देने के लिए

उस जिस्म को,
दर्द ने चूस कर छोड़ दिया है जिसे

मगर मैं खुश हूँ कि
आज सुबह आखरी बार रोने के बाद
जब आईने ने पकड़ कर
मुझे अपने सामने खड़ा किया
तो वहां एक लचक देखी मैंने
जैसे चेहरे से एक भारी दुःख नीचे खाई में लुढ़क गया हो

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अब मुझे वे दिन याद नहीं आयेंगे
जिन दिनों में
मैं ठिठका सा पड़ा रहता था
उस इंतज़ार में
कि तुम मेरा स्पर्श उठा कर
जाने कब अपने बदन पे रख लोगी
और वे वहां ठहर जायेंगी
कभी न ख़त्म होने वाली फुरसत की तरह

वे पल भी अब नहीं होंगे
जब हर लम्हें को खींच कर
तुम समय से आगे इस तरह ले जाती थी
कि वे वक़्त के किसी निर्वात में ठहर जाते थे
और मैं अधिकतम गति से
झूल जाता था उन लम्हों को पकड़ के

अब वे दिन भी नहीं होंगे
जब मैं लिख दिया करता था
तुम्हारे बालों पे क्षणिकाएं
और तुम कहा करती थी
कि तुम्हारे बालों पे नहीं हो सकती क्षणिकाएं
इसलिए ये किसी दूसरे के बालों पे हैं

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ये सब अब कुछ नहीं होगा
ये सब होता गर तुम होती
भले ही कोसता तुम्हें, कहता बेवफा
और लिखता कवितायें
कि तुम पढ़ सको और हो सको बर्बाद.

Monday, March 15, 2010

जाने क्यूँ आज ये प्यार छोटा पड़ रहा है

कितनी देर और,
भला कितनी देर और
लिखी जा सकती है इस तरह
इक तरफ़ा
प्रेम या विरह की कवितायें

हालांकि यह किसी शक या शिकवा करने जैसा है
और इसलिए मैं अभी तक बचता रहा हूँ यह कहने से
कि मुझे नहीं मालुम
तुम्हारी रातों में दरारें पड़ती हैं या नहीं
और अगर हाँ तो क्या वहां से कुछ रिसता भी है

जाने क्यूँ आज ये जरूरी सा लग रहा है
कि तुम्हारी भी रातों में दरारें हों
खास कर
जब मैं रिस रहा होऊं यहाँ अकेला
तुम भी बार-बार चिहुंक कर उठो नींद से
जब मेरी जीभ सूखे

मुझे आज क्यूँ ये लग रहा है कि
उस नीम के पेंड के सूखते तने में
कील से ठोक कर चली गयी मुझे तुम
और मैं रिस रहा हूँ वहां से लगातार कवितायें,
और तुम्हारी रातों में
इक दरार तक नहीं

जाने क्यूँ आज ये प्यार छोटा पड़ रहा है

जबकि मैं थोड़ी देर और लिखते रहना चाहता हूँ
प्रेम और विरह की कवितायेँ
इसी तरह
यह जानते हुए भी कि
तुम्हारी रातें हैं अक्षत...अविघ्न..