Thursday, August 27, 2009

आंखों की धार भी चुपचाप बहती है !

एक सन्नाटा है यहाँ अब
छितराया हुआ
फर्श पर, बरामदे में, आँगन में, ज़ीने पर
बाहर लॉन में
हर तरफ

सन्नाटे को देखने के लिए
नजर घुमानी नहीं पड़ रही

सब खाली हो चुके हैं आवाज से
न ताकत बची है बुदबुदाने की भी किसी में
और न वजह

हवा सांय-सांय भी नहीं कर रही
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा

30 comments:

mehek said...

सब खाली हो चुके हैं आवाज से
न ताकत बची है बुदबुदाने की भी किसी में
और न वजह

हवा सांय-सांय भी नहीं कर रही
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है
bahut gehre bhav,kabhi kabhi sannate se bhiapnepan ki khusbu aati hai.

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

प्रतीक्षा, की शायद यही तासीर होती है कि जो ना आने का कहकर गया हो उसका भी या उसका ही इंतज़ार होता है।

सन्नाटे को तौड़ने के लिये पदाचाप...... कान सुनने को बेताब....

हमेशा की तरह ही भावभरी रचना, इन मासूम से ख्यालों से कितनी अच्छा रच लेते हैं आप, आपको पढ़ना सुकून देता है।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

kshama said...

आँखों की धार आवाज़ करती तो क्या बात थी ..कोई तो सुनता ..ये हमेशा खामोश बहती है ...और सन्नाटे कानों को बधीर कर देते हैं ..ऐसे सन्नाटों से ईश्वर महफूज़ रखे..! वरना ये ता -उम्र पीछा कर सकते हैं ..आप की हरेक रचना में दर्द महसूस करती हूँ..बड़ी शिद्दत के साथ...दुआ करती हूँ,कि, ये रचना तक सीमित रहे...जीवन में न उतर पाए...

वाणी गीत said...

कविता में ऐसे खोये की चारों ओर सन्नाटा सा पसरा नजर आने लगा ...कुछ मुस्कुराना पड़ेगा ..ऐसे नहीं चलेगा ..!!

मीनू खरे said...

भावपूर्ण रचना ओम जी .

महफूज़ अली said...

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा .........

waaqai mein jo chale jaate hain........ unki khaamoshi bahut akhartee hai....

bhaavpoorna chitran ke saath ek dil ko choo lene wali rachna....


-------------------------------











OMji.....namaskar........... kal phir aapka fone hi nahin laga ........ baar baar.... ton--ton ki awaaz ke saath call reject ho ja rahi thi......

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

hawa saay saay behti hai...
wah ji om ji wah...
bahut he achhi baat kahi hai aapne...

विनोद कुमार पांडेय said...

ओम जी,शब्द की प्रबलता तो है ही आपकी इस रचना मे साथ ही साथ भावनाओं और संवेदनाओं की इतनी खूबसूरत अभिव्यक्ति भी पिरोए हुए है..

ऐसी रचनाएँ चाहे जितनी बार पढ़ो मन को हमेशा नयी ही लगती है..

बधाई!!!

vandana said...

na aane wale ka intzaar.......waah bahut hi gahre bhav liye hai.

raj said...

bus etna kahungee..sara ghar le gya ghar chhodh ke jane wala.....

शारदा अरोरा said...

ये मौन का घर बोलता बहुत है
इसको लेखनी ने दे दी है ज़ुबां
मन के कागज़ से उठ कर डोलता बहुत है

सागर said...

पिछले कुछ दिनों से लगातार आपकी कविता पढ़ रहा हूँ, पर कोई कमेन्ट नहीं कर रहा... जानता हूँ की यह सिर्फ रचना नहीं है... यह वास्तविक दर्द है जो लिखने में आ रही है.... यह दर्दनाक है, भयावह भी... आप संभव हो तो कुछ दिनों का ब्रेक ले लें... इतने दिन जितना दिया वो बहुत है... हम इंतज़ार कर लेंगे...

कंचन सिंह चौहान said...

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा


जिस बात से आँखें नम हो जायें उस पर बहुत खूब तो नही कह सकती...!

Nirmla Kapila said...

हमेशा की तरह भावनाओं से भरपूर कविता पढ्ते ही लगता है हम मौन के खाली घर मे ही बैठे हैं शुभकामनायें

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इतनी जीवंत रचना कि मुझे अपने आस-पास सन्नाटा महसूस होने लगा...

महामंत्री - तस्लीम said...

Satya vachan.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

sada said...

वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा .

हमेशा की तरह ही भावभरी रचना !

vikram7 said...

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा
आर्य जी,आपकी कविताओं के भाव बरबस मन को
बार बार पढ़ने के लिये मजबूर करते हॆ.मासूम ख्यालों से युक्त भाव पूर्ण रचना

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" said...

चुपके-चुपके आप कोई बड़ी बात कहते हैं ,दरअसल बड़ी बात इसलिए कह रहा हूँ क्योकि आपकी रचनाओं का दर्द हमेशा बड़ा विशाल मालूम होता हैं . .....................ओम जी कई दिनों बाद ब्लॉग पर आ सका हु असल में पंद्रह अगस्त के उपलक्ष्य में थोडी सी हिंदुस्तानियत खोज रहा था .....................

प्रवीण शाह said...

.
.
.
अत्यन्त भावपूर्ण रचना...


जो न आने की कह गया है वह शायद न आये...
फिर भी जीवन को तो चलना ही है...
सन्नाटे की उम्र कभी भीं ज्यादा नहीं होती...
जिन्दगी के कोलाहल से...
गौर से सुनिये...
आ रहा है सन्नाटे को तोड़ने वाला...
मुझे तो पदचाप सुनाई देने लगी है...
आपको भी क्या ऐसा ही लगता है ?

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओम भाई,
सुईपटक सन्नाटा वज्रबधिर बना देता है...आँख से बहनेवाली धारा भी निःशब्द होती है... बिलकुल करीब पसरे इन उपादानों से गज़ब भावपूर्ण चित्र खींचा है आपने... जगत-समुद्र से अपने काव्य के मोती चुनने का आपका कौशल श्लाघनीय है.... अभिभूत हुआ जानिए... सप्रीत... आ.

Prem said...

आपका तो सन्नाटा भी बोलता है ,बहुत सुंदर भावः शुभ कामनाएं

दर्पण साह "दर्शन" said...

एक सन्नाटा है यहाँ अब
छितराया हुआ
फर्श पर, बरामदे में, आँगन में, ज़ीने पर
बाहर लॉन में
हर तरफ

Dil dhoondta hai phir wahi .....

सन्नाटे को देखने के लिए
नजर घुमानी नहीं पड़ रही

jahan se tum mod mud gaye the ...
wo mod ab bhi wahi khade hain...

सब खाली हो चुके हैं आवाज से
न ताकत बची है बुदबुदाने की भी किसी में
और न वजह

हवा सांय-सांय भी नहीं कर रही
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है....

tere jaane se kuch bhi to nahi badla,
raat bhi aayi thi aur chaad bhi tha...

...aankh ab bhi waise hi jhapketi hai...
..thodi si bheegi rehti hain bus.
aur kuch bhi nahi.

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा.....


badhiya !!
bahut badhiya !!!
hamesha ki tarah .

सैयद | Syed said...

सुन्दर रचना !

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

दर्द और विरह के अहसास को जो शब्द दिए है अद्भुद है
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही सुन्दर भाव अभिव्यक्ति.आभार

दिगम्बर नासवा said...

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा

YE SANNAATA KABHI TOOTEGA KYA ? AGAR YE VO ...... VO HI VO HAI TO SHAAYED YE SANNAATA HI JEEVAN BAN JAAYEG ..... LAJAWAAB ABHIVYAKTI HAI IS RACHNA MEIN ...

कमलेश वर्मा said...

जिद
धूप में पड़े रहे वो
खुले आसमान के नीचे
सूखते-टटाते
आखिर तक

पहले रंग उतरे उनके
और फिर उधडती गई
धीरे-धीरे
सीवन उनके बीच की,

छाँव खींच कर वे
आशियाना जमा लिये होते, गर
एक ने मान ली होती दूसरे की जिद

मगर वे अड़े रहे
न छाँव खींची, न जिद अपनी
पड़े रहे वे धूप में चिद्दिया उड़ने तक.

जाने क्यूँ, जाने कैसे!
Posted by ओम आर्य at Saturday, August 29, 2009 34 comments
Reactions:
Labels: एहसास, जिद, प्रश्न, बिखरना
Thursday, August 27, 2009
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है !
एक सन्नाटा है यहाँ अब
छितराया हुआ
फर्श पर, बरामदे में, आँगन में, ज़ीने पर
बाहर लॉन में
हर तरफ

सन्नाटे को देखने के लिए
नजर घुमानी नहीं पड़ रही

सब खाली हो चुके हैं आवाज से
न ताकत बची है बुदबुदाने की भी किसी में
और न वजह

हवा सांय-सांय भी नहीं कर रही
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा

कमलेश वर्मा said...

जिद
धूप में पड़े रहे वो
खुले आसमान के नीचे
सूखते-टटाते
आखिर तक

पहले रंग उतरे उनके
और फिर उधडती गई
धीरे-धीरे
सीवन उनके बीच की,

छाँव खींच कर वे
आशियाना जमा लिये होते, गर
एक ने मान ली होती दूसरे की जिद

मगर वे अड़े रहे
न छाँव खींची, न जिद अपनी
पड़े रहे वे धूप में चिद्दिया उड़ने तक.

जाने क्यूँ, जाने कैसे!
Posted by ओम आर्य at Saturday, August 29, 2009 34 comments
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Labels: एहसास, जिद, प्रश्न, बिखरना
Thursday, August 27, 2009
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है !
एक सन्नाटा है यहाँ अब
छितराया हुआ
फर्श पर, बरामदे में, आँगन में, ज़ीने पर
बाहर लॉन में
हर तरफ

सन्नाटे को देखने के लिए
नजर घुमानी नहीं पड़ रही

सब खाली हो चुके हैं आवाज से
न ताकत बची है बुदबुदाने की भी किसी में
और न वजह

हवा सांय-सांय भी नहीं कर रही
आंखों की धार भी चुपचाप बहती है

जाने कौन तोडेगा ये सन्नाटा अब
वो तो कह गया है
कि कभी नहीं आएगा

कमलेश वर्मा said...

जिद
धूप में पड़े रहे वो
खुले आसमान के नीचे
सूखते-टटाते
आखिर तक

पहले रंग उतरे उनके..


om ji koi nahi taala lga hai aapke blog par ..rachnayen swagat yogy hain ,sadhuwad,waah waah