Monday, August 31, 2009

दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है !

एक लम्बे दुःख ने
थका दिया है मुझे
या फिर उबा दिया है शायद

सुबह उठ कर जो आ बैठा था
बालकनी में इस कुर्सी पर
तब से कितने गोल दागे बच्चों ने
सामने खेल के मैदान में
पर पसीना नहीं आया मुझे

दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है

लहू मांगती है अब
सुख का ताप, थोडा सा
और
जिस्म पसीना मांगता है

सुबह-सुबह आईने में
मेरा चेहरा भी मांगता है
एक मुनासिब सजावट
जहाँ चीजें करीने से लगी हों
और एक बदन
जो सारी उबासी निकाल चुका हो

मन के पोर भी
बजते हैं बेचैन होकर,
सुनाई देती है उनकी थकन

अपनी हीं हथेली से
दबाता रहता हूँ उन्हें
पर कई हिस्से छूट जाते हैं

तुम बताओ
तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ कर जाने के बाद ??

52 comments:

mehek said...

uff dil ki baichaini har alfaz se nikal rahi,
दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है
waah ye line bahut gazab ki hai.

विनोद कुमार पांडेय said...

दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है,
सच्ची बात और सच्ची भाव...
बधाई!!

विनोद कुमार पांडेय said...

ओम जी आपके भाव मुझे बहुत प्रेरणा देते है.

Harkirat Haqeer said...

तुम बताओ
तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ जाने क बाद

ओम जी बहुत ही भावुक रचना ....कई बातें ऐसी होती हैं जिनको सिर्फ शब्दों में ही बाँधा जा सकता है गम हल्का करने के लिए ....!!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति बहुत पसंद आई आपकी यह रचना

bhawna said...

sheershak dekh kar hi laga tha ki kavita bhaavpoorn hogi aur...sach me bahut badhiya rachna .

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" said...

दुःख ............लहू को ठंडा भी कर देता हैं ,सीमाओं से परे जाती ये थकान ,और कमबख्त ज़िस्म पसीना मांगता हैं ,ओम भाई प्रणाम! ..............ज़िन्दगी किस तरह से आपकी रचनाओं में शामिल हैं .............

महफूज़ अली said...

bahut hi bhaavuk rachna......... ek ek alfaaz dil se nikal kar pen ki tip par aaa gaye hain........

विनय ‘नज़र’ said...

सुन्दर है
--->
गुलाबी कोंपलें · चाँद, बादल और शाम

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

apni he hatheli se dabaata hoon....
waah kya baat hai...

सागर said...

तब से कितने गोल दागे बच्चों ने
सामने खेल के मैदान में
पर पसीना नहीं आया मुझे


एक मुनासिब सजावट
जहाँ चीजें करीने से लगी हों
और एक बदन
जो सारी उबासी निकाल चुका हो

तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ कर जाने के बाद ??


...वो बेदर्दी से सर काटे और में कहूँ उनसे....
हुजुर, आहिस्ता, आहिस्ता जनाब आहिस्ता... आहिस्ता.. !

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में व्‍यक्‍त यह रचना आभार्

AlbelaKhatri.com said...

वाह !
हथेली से दबाना
और कुछ हिस्से छूट जाना.........
गज़ब !
गज़ब !
गज़ब !

vandana said...

मन के पोर भी
बजते हैं बेचैन होकर,
सुनाई देती है उनकी थकन


behad gahre aur khoobsoorat bhav.

परमजीत बाली said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना है बधाई स्वीकारें।

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

भावनाओं से भरा एक अप्रतिम सृजन!!!

आपकी रचनाओं में संजीदगी ने मुझे हमेशा प्रभावित किया है, रचनायें बड़ी देर तक अपना असर बनाये रखती हैं।

ऐसा ही अच्छा लिखते रहिये।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

raj said...

तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ कर जाने के बाद ??
pad ke ek dard sa uthha..ab to ahsaas nahi hota hai..dard hota to hai par kaha hota hai...

Pankaj Mishra said...

जिन्दगी को करीब से छूती रचना
आभार

kshama said...

Ye dard ka samandar itna gahra hai..kabhi thah nahee lag sakta..haina?

Nirmla Kapila said...

हर दिन एक नयी गहरी और दिल को छू लेने वाली अभिव्यक्ति ले कर आते हैं आप ये भावनायें भी कितना व्यथित कर देती हैं इन्सान को ---- कोई अन्त नहीं कोई किनारा नहीं --- शुभकामनायें

Science Bloggers Association said...

Aapki soch laajawaab kar deti hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रश्मि प्रभा... said...

दुःख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है
sach hai,par angaare bhi bharta hai

काव्या शुक्ला said...

Yakinan.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को प्रगति पथ पर ले जाएं।

M VERMA said...

तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ कर जाने के बाद ??
बेहद संवेदनशील कर दिया आपने तो. --- और फिर दु:ख शायद लहू को ठंडा भी कर देता है. क़्या एहसास है.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

dukh ...hamare tamaam bhavo ko badi khoobsoorati prdaan kar detaa he aour vakai jab esa hota he to ek behtreen rachna ka avtaran ho jaataa he, jesi aapki rachna../
bahut achhi aour sadhee hui rachna.

Amit K Sagar said...

वाह! क्या लिखा है! जारी रहें.
---

आप हैं उल्टा तीर के लेखक/लेखिका? विजिट- http://ultateer.blogspot.com

vikram7 said...

मन के पोर भी
बजते हैं बेचैन होकर,
सुनाई देती है उनकी थकन

अपनी हीं हथेली से
दबाता रहता हूँ उन्हें
पर कई हिस्से छूट जाते हैं
सुन्दर अभिव्यक्ति

योगेश स्वप्न said...

BAHUT KHOOB.

Udan Tashtari said...

बहुत ही भावुक रचना ..बधाई.

अमिताभ मीत said...

Behtareen hai bhai. Badhaai.

venus kesari said...

mrmsparshi rachnaa hai

venus kesari

दर्पण साह "दर्शन" said...

kuch na keh paaonga om ji...

shabdon se aapne jis tarah ka jaal; buna hai...

man us balcony main bath rah hai mano...

likhte wakt man ki stithi munfi rahi hogi,
par pathakoon ke liye iska asar door talak hoga...

kuch lines to baha le jaati hai....
"बालकनी में इस कुर्सी पर
तब से कितने गोल दागे बच्चों ने
सामने खेल के मैदान में
पर पसीना नहीं आया मुझे"

aur ye bhi ek sajiv line hai...

"सुबह-सुबह आईने में
मेरा चेहरा भी तलाश करता है
एक मुनासिब सजावट
जहाँ चीजें करीने से लगी हों
और एक बदन
जो सारी उबासी निकाल चुका हो"

lekhan ki utkrishta hetu badhai sweekarein....

Mrs. Asha Joglekar said...

तुम बताओ
तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ जाने क बाद
wah !

दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT HI LAJAWAAB OM JI .... 7 DIN CHUTTI BITANE KE BAAD AAJ AARAAM SE AAPKI KAVITAAON KA AANAND LE RAHA HUN .......

aruna kapoor 'jayaka' said...

भावों की बेहतरीन अभिव्यक्ति मेहसूस करने को मिलती है, धन्यवाद!

सैयद | Syed said...

वाह ओम भाई.... कहाँ से लाते हैं ऐसे ज़ज्बात....

बहुत ही भावुक !!

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओम भाई,
इधर थoडी व्यस्तता रही, विलंब से आया आपके ब्लॉग पर ! बेहतरीन भावाभिव्यक्ति ! बड़ी संजीदगी से ज़िन्दगी की कश-म-कश को चिन्हित करती है ये रचना आपकी ! बधाई मेरी देर से ही सही स्वीकारें !

डॉ .अनुराग said...

अजीब इत्तिफाक है इन दिनों हर कोई दुःख पे लिख रहा है......क्या सबने दुखो के रजिस्टर खोल दिए है

hindustani said...

बहूत अच्छी रचना. कृपया मेरे ब्लॉग पर पधारे.

सुलभ सतरंगी said...

हथेली से दबाना
और कुछ हिस्से छूट जाना.........

और फिर जन्म लेती है एक और बेचैनी. हाँ बिलकुल आपकी कविताओं में उभरते है ये सब.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

लहू मांगती है अब
सुख का ताप, थोडा सा
और
जिस्म पसीना मांगता है

बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचना है।
बधाई!

मीनू खरे said...

बहुत ही भावुक रचना ....बहुत पसंद आई आपकी यह रचना

कुलवंत हैप्पी said...

एक शानदार...काव्य..इसको पढ़ तो बहुत पहले लिया था... लेकिन अफसोस प्रतिक्रिया से चूक गया था क्योंकि आफिस में कुछ साईट ब्लॉक है...इस लिए..

Archana said...

एक जैसा दुःख मेरा तुम्हारा ,
मैंने खोया चाँद, तुमने तारा ,
मैंने खोयी खुशी ,तुमने हँसी ,
फ़िर भी हम दोनों को जीना है,
अपने आंसुओ को अकेले पीना है ...

Apoorv said...

ओम साहब..पिछले कुछ वक्त से आपका ब्लाग देखना शुरु किया..तबसे आपकी कलम का प्रशंसक बन गया..एक अनुभूति को इतने वृहद कोणों से देख पाने की आपकी क्षमता अद्भुत है..आपकी लेखनी के लिये शुभकामनाएं!
आभार
अपूर्व

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही सुन्दर मनोभाव...... आभार.

पारूल said...

मेरा चेहरा भी तलाश करता है
एक मुनासिब सजावट
जहाँ चीजें करीने से लगी हों...kaarigiri vaali baat hai ye to...badhiya

रज़िया "राज़" said...

तुम बताओ
तुम क्या करती हो
जब पीठ में दर्द होता है तुम्हारे
मुझे छोड़ कर जाने के बाद ??
जीवन के अनमोल पलों की सुहानी यादों को ऐसे टटोला है कि जानेवाला भी लौटकर दौडकर भागा चला आये। वाह!!!

निर्झर'नीर said...

excellent........yakinan kabil-e-tariif

योगेश स्वप्न said...

wah , kya khubsurti hai is bhatkaav men.

khwaab bhatak kar aa jaate hain kyun aankhon men
koi ek pahunch pata hai ghar laakhon men

sa said...
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水煎包amber said...

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