Sunday, July 25, 2010

खाल उतारने की प्रक्रिया जारी है!


ये अच्छा है
कि इस कविता में जिन्हें आना था
उनमे से कुछ तो अभी व्यस्त हैं
एक मरे बैल की खाल उतारने में
कुछ अपनी छाती से
भूख पिला रही हैं अपने बच्चों को
और कुछ इस इंतज़ार में हैं
कि उनके देह हों तो वे उन्हें बेंच सके
और इसलिए ये संभव है
कि कविता अब वीभत्स होने से बच जाए

जहाँ खाल उतारने की प्रक्रिया जारी है
वहां किसी उत्सव की आशा में
ढेर सारे बच्चे
घेरे में खड़े हैं
अपनी लपलपाती आँखों के साथ
और बार-बार लताड़ने पे भी
पीछे नहीं हटते

उधर ऊपर ताड़ के पेंड़ो पे बैठे
कौवो,गिद्धों और चीलों को भी
इस उत्सव का भान है
और उनके इन्तिज़ार नहीं थकते
वे शायद ईमानदार भी हैं
नहीं तो बस्ती में कई बच्चों का वजन इतना भर है
कि उन्हें लेकर उड़ा जा सकता है

क्षमा कीजिये गर
ये कविता वीभत्स होती जा रही हो
और कवि असंतुलित
जबकि पूरी कोशिश की जा रही है कि ऐसा न हो
जैसे इस तरह की कई चीजें
अभी आपसे छुपाई जा रही हैं कि
बाढ़ और अकाल के दिनों में
सिर्फ सड़ी अंतड़िया होती हैं उनके खाने के लिए

वैसे मुझे लगता है
कवि के असंतुलित हो जाने में
कोई बुराई नहीं है
गर दुनिया के एक अरब लोग भूख से दबे हों
और उठ नहीं पा रहे हों

और कुछ लोग लगे हों इसमें कि
उनके खाल उतारे जा सकें

(संजुक्त राष्ट्र के हाल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के आठ राज्यों में २६ अफ़्रीकी देशों से ज्यादा गरीब लोग रहते हैं )

***

27 comments:

सुधीर said...

sunder kavita.

Sonal Rastogi said...

यही परिस्थिति भारत में सदियों से चली आ रही है .... हम चमचमाते शहरों में देख नहीं पाते

kshama said...

uff!Kitni peeda hai is kavita me!

Archana said...

भयावह ............किन्तु सत्य...........

M VERMA said...

कवि के असंतुलित हो जाने में
कोई बुराई नहीं है
गर दुनिया के एक अरब लोग भूख से दबे हों
और उठ नहीं पा रहे हों
और कुछ लोग लगे हों इसमें कि
उनके खाल उतारे जा सकें

या शायद खाल उतारने पर आमादा लोगों को अंततोगत्वा यह पता चले कि खाल तो इनकी है ही नहीं उतारे क्या !!
कितनी गहराई भरी दृष्टि की रचना है.

बहुत सुन्दर

Razi Shahab said...

behtareen bhav hain

वन्दना said...

पीडा का मर्मांतक चित्रण्।
कल (26/7/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सुंदर भावाभिव्यक्ति.

mukti said...

कवि के असंतुलित होने में कोई बुराई नहीं है... कवि असंतुलित होता है तभी ऐसी कविता निकलती है... संवेदनशील मन पर ही भूख की खबरें असर करती हैं.
दिल-दिमाग को झकझोर देने वाली है ये रचना.

संध्या आर्य said...

आपकी रचना को पढ्कर कुछ भाव मेरे आँखो को नम कर गये और मन को कुछ चंद शब्दो मे भिंगो कर चले गये जो इस तरह है ..........



शहर, गाँव ,परिवार और
मानवियता से कोसो दूर
इन बाशिंदो के अंदर
सिर्फ एक पनपती भूख
क्योकि माताओ के कोख मे ही
होती भूख से हाथे दो चार

सूरज और चाँद सितारे सब
आते सांझ सकारे सब
धरती होती बांझ यहाँ की
फट्ती धरती रोज यहाँ की
आग बरसती आसमानो से
जननी होती बेबस जब
झोकती भूख जलावन मे
भेश मे होती अवशेषो की

आदिमानव दिखते बेबस
चमडो के संसार यहाँ पर
मांसो से है भरते पेट
चील गिद्धो से परहेज नही,
पर पाये गये निवालो से
होती जश्न यहाँ पर अक्सर
बच्चो और जवानो मे

क्या बच्चे ,क्या बुढे और जवान
सबके सब दिखते एक समान
यौवन भी होती भूख से भारी
कुम्हला जाती कुछ चंद दिनो मे
पर ना होते भाव कही भी
होती एक सनातन भूख


अन्नाजो पर भेंट चढकर
दावत होती नून भात की
यौवनाओ की कुर्बानी से
आसमान के फटते ही
कोख हरी होजाती है
तब वो बच्चे खून चूसकर
हो जाते अछूत कही!

पारूल said...

:(

महफूज़ अली said...

आप तो मन को छू लेते हैं....

अजय कुमार said...

अमीर और अमीर ,गरीब और गरीब हो रहे हैं । बेहद दर्दनाक कविता ।

Avinash Chandra said...

likhun kya?

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

great work OM bhai.

सागर said...

तारीफ बहुत हुई, हम भी थक गए कमेन्ट करते - करते. अब किताब की दरकार है, छपवाने की सोचें. सिरिअसली.

Parul said...

waah sir...chitra jitna marmik hai..rachna bhi utni hi marmsaprshi hai..amazing..

दर्पण साह said...

PS:आपकी पिछली ३-४ कविताओं में से आग निकल रही में ओम जी.
जो मुझ जैसे को भी ऐसे बोल्ड कमेन्ट लिखने पर विवश कर रही है.
सागर जी कि बात मानें.
और सभी कविताओं के लिए बधाई.
सोच रहा हूँ दुनिया ऐसी क्यूँ है?

दर्पण साह said...

हाँ सच ॐ जी जिनके लिए कविता लिखी जाती है कविता तक वो पहुंचे ये संभव नहीं और ये बात (जैसा की आपने भी कहा कि) कविता के लिए अच्छी ही है.
अतएव, कविता को उन तक पहुंचना होगा, लेकिन उससे पहले इन 'कविताओं के सरोकार' और खाना (कम से कम). (क्यूंकि हम मतलबी हैं और हमने ये पढ़ा है कि भूखे पेट भजन नहीं होते.) लेकिन उन तक 'कविता के सरोकार' राजीव गाँधी के एक रूपये की तरह पहुँचते हैं. भूख से कोई नहीं मरता. और अगर रोटी नहीं है... केक खाए जाने चाहिए. इसलिए खाना भिजवाने की बात छोड़ दें और उन्हें कविता भिजवाई जानी चाहिए. अगर भूख लगे तो प्रेम किया जाना चाहिए, अगर प्यास लगे तो मोजार्ट की सिम्फनी बजाई जानी चाहिए. हाँ अगर मौत आये तो वो भी...
"आखरी हिचकी तेरे जानो से आये मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ."
वाह ! वाह !! (मुझे लगता है की ऐसी विक्षिप्त कविता को पढ़ लेने के बाद पाठक के असंतुलित हो जाने में भी कोई बुराई नहीं है.)
वैसे भी मुझे आपकी बात पे कतई विश्वाश नहीं है. आके देखो जरा दिल्ली कैसे सजी जा रही है. कॉमन वेल्थ (सर्वार्थ) के लिए. क्या सरकार इतनी बेवकूफ है जो ये सब नहीं देख रही? अजी छोड़िये उनके पास हमसे ज्यादा रिसोर्सेज़ हैं.देखा नहीं न्यूज़ में (हाँ इंडिया टीवी में कभी कभी आती है और उसे टी आर पी की भाषा में लंगर कहा जाता है.) कुछ और लोगों के साथ अम्बानी सा'ब को जिम्मा सौंपा गया है. न न भारत का नहीं. पूरे विश्व का. जो बची खुची गरीबी है वो तो बस यूँ गायब हो जानी है.उनका नेटवर्क बद्रीनाथ तक पहुँचता है जी . भगवान की गारंटी कौन ले. अक्षरधाम से गुज़रते वक्त मेरे मोबाइल के नेटवर्क क्यूँ जाम हो जाते हैं. इन अरबों रुपयों (रुपयों का नया चिन्ह देखा?) के लिए कितने भूखे लोग किसी और कारणों से मरे होंगे? (क्यूंकि भूख से तो कोई नहीं मरता) अगर मरता तो भूखे लोग जिंदा क्यूँ हैं? (मुझे लगता है की ऐसी विक्षिप्त कविता को पढ़ लेने के बाद पाठक के असंतुलित हो जाने में भी कोई बुराई नहीं है.)

एक पेकेट सिगरेट ५० रूपये की आती है. दिल जलता है भाई सा'ब. कम से कम आत्मा तो छोड़ दें. आओ मिल के कवितायेँ लिखें.कुछ नए बिम्ब ढूंढ के रखे है प्रेम कविताओं के लिए चाहिए?

दर्पण साह said...

उनकी शक्लें ढह गयी आँखों में
लास्ट की चार लाइन कक्का जी कहिन की याद दिलाती है...
"कौन भ्रष्ट बूढ़ा ऐसा है जो क्रन्तिकारी नौजवान नहीं रह चुका है? और कौन क्रन्तिकारी ऐसा है जो..."
और वो ज़ावेद अख्तार सा'ब
"नरम आवाज़, भली बातें मुहज्ज़ब लहजे
पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं"
सच ॐ जी कभी कभी ऐसा लगता है की जो लिखा सब व्यर्थ था. कभी इस कारण से दुनियाँ को नहीं बदल पाए. कभी नून-तेल के चक्कर में.

शरद कोकास said...

अनकहा बहुत कुछ कह दिया आपने इस कविता में ।

सुशीला पुरी said...

ओह ! इतना कटु यथार्थ ? ऐसा लग रहा है जैसे भरे बाजार मे वस्त्रहीन होकर घूम गया हो भारत !

ktheLeo said...

ये क्या कर रहे हैं आप? सभ्य और प्रगतिशील समाज को आईना दिखाना गुनाह है! और वो भी आप इतने भयावह प्रतिबिम्बों का प्रयोग करते हुये कर रहे हैं,चांद पर जाने की चाह रखने वाले समाज को अच्छा नहीं लगेगा ये चित्रण! परन्तु आपकी संवेदनशील सोच को सलाम।

अपूर्व said...

मुझे कविता मे लोग, बच्चे या गिद्ध कहीं नजर नही आ रहे..मुझे बस भूखी आंखें प्यासी जीभें और सूखी हुई खालें नजर आती हैं..खैर यू एन की रिपोर्ट उन्ही बातों को सत्यापित करती है जिन्हे हम पहले से ही जानते हैं...वैसे दर्पण के कमेंट के बाद अब कुछ कहना बस गाल बजाना ही होगा..सो और क्या बोलूँ...

वाणी गीत said...

हालातों को बयान करती संवेदनशील कविता ..!

संध्या आर्य said...

भूख अब एक आदत है
नित्य क्रियाओ की तरह
निपट लेने आता है
बिना पानी और साबुन के भी

भूख की चित्कार सदियो पहले
दफना दी गयी थी
हमारे ही पूर्वजो के द्वारा
जो इन्हे अछूत घोषित कर
अछूत होने का श्राप दिया था

आज भी बिलबिला रहे है
अपने श्रापित
अछूत जीवन मे
हमने ही इनकी मानविय आंखे निकाली थी
और हमे ही इनके आंखे लौटानी होगी!

Alok Kumar Jha said...

meri samajh se apne koi kavita nahi likha hai, aaj apne hame aina dikhaya hai. ab waqt aagaya hai apne office ke AC room s nikalkar kuch apne janmbhoomi ke liye karne ka.