Friday, October 31, 2008

रिश्तों की रूहें

पतझड़ में जो पत्ते

बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से

वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं !

वे कहीं भी जाएँ

पर उन सूखे पत्तों की रूहें

उसी आशियाने की दीवारों पे

सीलन की तरह बहती रहती है

किसी भी मौसम में

ये दीवारें सूखती नहीं

ये हमेशा नम बनी रहती हैं

मौसम रिश्तों की रूहों को सुखा नहीं सकते।

7 comments:

Rachna Singh said...

मौसम रिश्तों की रूहों को सुखा नहीं सकते।
bahut sunder
i liked it

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत ख़ूब...

manvinder bhimber said...

पतझड़ में जो पत्ते

बिछड़ जाते हैं अपने आशियाने से

वे पत्ते जाने कहाँ चले जाते हैं !

वे कहीं भी जाएँ

पर उन सूखे पत्तों की रूहें

उसी आशियाने की दीवारों पे
बहुत ख़ूब...

मीत said...

क्या बात है !! बहुत ही उम्दा.

Udan Tashtari said...

बहुत ख़ूब!! बहुत उम्दा!!

Madix said...

rishton ki gahraaiee isee ko kahten hain mere bhaee. Jo in bhaavnaaon ko samajh sakta hai nishchit hi wah logon ke liye kaphi kuchh kar sakta hai.

shama said...

Kitnee panktiyon ka ullekh karun ? Pooree rachna likhnee hogee...aur comment yahan de rahe hun par sabhee rachnayen ateev sundar hain...aur hairat hai ki aapne ek auratke nazaryese likha hai.....aur itna sahee...!