Wednesday, February 3, 2010

अभी मैं कविता के एक मुश्किल वक्फ़े में हूँ

अभी मैं
कविता के उस मुश्किल वक्फ़े में हूँ
जहाँ अंतर्द्वंद मांग करता है एक सिगरेट
और आस-पास के सारे लब्ज
कन्नी काटते लगते हैं

हालांकि
खुल कर सामने नहीं आ रहे अभी वे
पर उनकी आँखों में इनकार की स्पष्ट रेखा है
और मैं भी ज्यादा जोर नहीं दे रहा उनपे
ये सोंच कर कि
कहीं गुरेर न दे वे आँख अपनी

दरअसल मैंने सुना है
उन्हें बतियाते हुए
वे भरे हैं रोष से
प्रेम के बेहद गैर-जिम्मेदाराना रवैये के बारे में,
प्रेम से लुप्त होती जा रही पारदर्शिता
और प्रेम के लगातार दागदार होते जाने पर

उनका कहना है
कि प्रेम कवितायेँ एक झांसा है
जो लाती है
कुछ टूटे व्यक्तियों की उम्मीदों में गैर जरूरी उछाल
और बढ़ा देती है उनके समंदर की आँखों का वजन

कि प्रेम कवितायें
प्रेम जैसी किसी चीज की
वास्तविक उपस्थिति के बारे में
बस एक धोखा भर है

कि बचपन और किशोरावस्था के बीच
सिकुड़ती जा रही दूरी के बीच खड़े मासूमों की
मौत का सबब हैं ये प्रेम कवितायें

वे मुझे नकारते हैं
मेरी किसी भी ऐसी कोशिश के विरोध में
जिसमें प्रेम कों 'देवदासिया' दिखाया जाने वाला होता है

आगे उनकी योजना है
कि किसी भी ऐसी कविता या
ऐसे षड़यंत्र रच रहे कवि के खिलाफ
लब्ज लामबंद होंगे
उन्हें कवि कर्म से निष्कासित किया जाएगा
या नहीं तो कम से कम
लम्बे समय तक
मुअत्तल किया जाएगा

अभी मैं
कविता के उस मुश्किल वक्फे में हूँ
जहाँ प्रेम के होने और न होने पर भारी अंतर्द्वंद है
लब्ज उद्वेलित हैं
और मैं खोज रहा हूँ एक सिगरेट
और सोंच रहा हूँ
प्रेम और प्रेम कविता में से कौन पहले जा रहा है...

24 comments:

रंजना said...

अंतर्द्वंद को सार्थक सफल अभिव्यक्ति दी है आपने....
प्रेम व्यवहार रूप में जिस प्रकार संकुचित और भौतिक होता जा रहा है,उसपर प्रभावी प्रहार किया है आपने...

dimple said...

जहाँ अंतर्द्वंद मांग करता है एक सिगरेट
और आस-पास के सारे लब्ज
कन्नी काटते लगते हैं wo passive smoker nahi banna chahte.

प्रेम कवितायेँ एक झांसा है
जो लाती है
कुछ टूटे व्यक्तियों की उम्मीदों में गैर जरूरी उछाल
और बढ़ा देती है उनके समंदर की आँखों का वजन

mujhe lgta hai ki समंदर or aankhe bhi aaps me mile hue hai.

आगे उनकी योजना है
कि किसी भी ऐसी कविता या
ऐसे षड़यंत्र रच रहे कवि के खिलाफ
लब्ज लामबंद होंगे
उन्हें कवि कर्म से निष्कासित किया जाएगा
या नहीं तो कम से कम
लम्बे समय तक
मुअत्तल किया जाएगा ye badhiya raha.

सागर said...

दोनों में से कोई कहीं नहीं जा रहा है... हमारी बातचीत को आपने कविता का रूप दे दिया... निस्संदेह बहुत बेहतर बन पड़ी है और बिलकुल नए अंदाज़ में और अगर यह अभिव्यक्ति हो तो लामबंद होने की कोई जरुरत नहीं ओम भाई... क्या पता हम क्या खोजते हों... यह नया रूप लेकर आते हुए देखिये आप क्या कमाल जंच रहे हैं...

pukhraaj said...

कि बचपन और किशोरावस्था के बीच
सिकुड़ती जा रही दूरी के बीच खड़े मासूमों की
मौत का सबब हैं ये प्रेम कवितायेँ ...
इन लाईनों में तो आपने आज की सच्चाई बयां कर दी है ...बचपन तो जैसे न जाने कहाँ खो सा गया है ...

Razi Shahab said...

sundar

संध्या आर्य said...

पहनते ओढते वक्त को
मैने
इसके लिबास को नही देखा
जहाँ,जैसे भी
उसने दिया
मैने पहन लिया


वक्त का एक लम्हा

जो मेरे हिस्से का कतरन था
उसके हाथ से छूट गया
था
जो सिर्फ मेरा था

कही उड गया था

जो बडा ही उदास
एक पुरानी दरख्त के शाख से
टंगा हुआ
मिला

जिसके उपर न जाने कितने जख्म थे

दर्द मे लिपटा वो लम्हा आज
कराह रहा है
चिन्दी चिन्दी हुये ख्वाहिशो के साथ


आज मैने देखा है
वक्त के उस लम्हा को
जिसमे उसके एहसास नंगी है तो
अरमान चिथडो मे !

M VERMA said...

जहाँ प्रेम के होने और न होने पर भारी अंतर्द्वंद है
अंतर्द्वन्द स्वयं में एक नई विचारधारा या आरम्भ का प्रथम बिन्दु होता है.
आपका यह खूबसूरत अन्दाज काफी सुन्दर है.
स्वागत

योगेश स्वप्न said...

sunder abhivyakti.

Udan Tashtari said...

मनोभावों और अंतर्द्वंद को बहुत सहजता से उकेरा है, बधाई.

kshama said...

Shayad aise antar dwnd kayoyon ke dimaag me chalte ho...har koyo unko itni khoobsoorat alfazon ki pairhan pahna nahi sakta..is taraha se pesh nahi kar sakta!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

bahut he achhi baat keh di aapne OM bhai..

aafareen!

गौतम राजरिशी said...

ईश्वर जाने कौन से लफ़्ज़ हैं ये कमबख्त...कवि न ही सुने उनकी बातें तो अच्छा हो।

अर्कजेश said...

आप एक नये अंदाज में प्रकट हुआ है आपका द्वंद और कविता । शुभ है ।

बहुत ही बेहतरीन उकेरा है ।

Mithilesh dubey said...

क्या बात है , बहुत खूब ।

अपूर्व said...

कि प्रेम कवितायेँ एक झांसा है
जो लाती है
कुछ टूटे व्यक्तियों की उम्मीदों में गैर जरूरी उछाल
और बढ़ा देती है उनके समंदर की आँखों का वजन

..बिल्कुल सहमत!!
दोनो मे से कोई नही जायेगा..क्योंकि प्रेम-कविताएं और प्रेम दोनो एक दूसरे के मोहताज नही रहते!!

महफूज़ अली said...

अभी मैं
कविता के उस मुश्किल वक्फ़े में हूँ....


लेकिन क्यूँ? इतना अच्छा तो लिखे हैं....

वन्दना said...

kay kahun?...........shabd dhoondh loon phir aati hun.

dimple said...

वक्त का एक लम्हा

जो मेरे हिस्से का कतरन था
उसके हाथ से छूट गया
था
जो सिर्फ मेरा था

कही उड गया था

जो बडा ही उदास
एक पुरानी दरख्त के शाख से
टंगा हुआ
मिलाye kavita udas se sapne jaisee kheenchti hai apni or jane kyun...

सागर said...

पुनःश्च,

दिल नहीं भर रहा इसे पढ़कर... आपकी अब तक की सबसे बेहतरीन कविता

ओम आर्य said...

कविता आप सब लोगों तक पहुंची, आप सबों के आशीर्वाद के लिए आप सब का तहे दिल से आभार

अनिल कान्त : said...

aapki behtreen rachnaon mein se ek hai ye...

superb !

Tejaswi Sharma said...

Bahut hi badhiya. Abhi isse jyada kuch nahi kah sakta.

निर्मला कपिला said...

कि प्रेम कवितायेँ एक झांसा है
जो लाती है
कुछ टूटे व्यक्तियों की उम्मीदों में गैर जरूरी उछाल
और बढ़ा देती है उनके समंदर की आँखों का वजन
फिर भी उस झाँसे मे पूरी तरह डूब कर लिख्गते हैं बहुत सुन्दर कविता है। पता नही कितना आत्मचिन्तन करते हो दिल को छू जाती है आपकी हर रचना शुभकामनायें

sada said...

हर शब्‍द जाने कितना कुछ कहता हुआ, बहुत ही सुन्‍दर रचना ।