Saturday, February 20, 2010

एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती है
वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा

अब जबकि सारी दुनिया ओट हो चुकी है
आवाज खींच के तुमने जो तानी है, उससे
मैं बेसब्र हो रहा हूँ कि
कितनी जल्दी तुम झुक जाओ तानपुरे पे
मुझे धुन देने के वास्ते,
और मैं निःशब्द हो जाऊं

मैं बहता हूँ पर शजर नहीं हिलते
खाली-खाली रह जाती है मेरी छुअन,
जिस्म जीवन का मिल जाए
अंक में भर लिया जाऊं गर तेरे एक बार
इसी इंतज़ार में हूँ बस

खाली हो गया था किसी समय,
कोई जगह सुनसान हो गयी थी मेरे अन्दर
और फिर भरा नहीं गया कभी
मेरी रिक्तता कों अब
तुम्हारी रूह मिले, तो चैन मिले

कुछ करो
कुछ करो अब कि
अगली बार जब पलकें झपक कर उठें
तो तुम्हारा आगोश सामने हों

एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे

22 comments:

M VERMA said...

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती है
वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा
यह भी सत्य है और
एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे
===
तादात्म की लय को तलाशती सुन्दर रचना

डॉ .अनुराग said...

dilchasp hai....

डिम्पल said...

मिल जा कही समय से परे वाली बात हो गयी..

निर्मला कपिला said...

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती है
वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा
ओम जी हर बार ऐसी रचना लिखते हैं कि कई बार पढ कर भी मन नही भरता ।उसकी गहराई को नापना मुश्किल हो जाता है अद्भुत रचना के लिये बधाई शुभकामनायें

डॉ. मनोज मिश्र said...

मन को छूती हुई रचना.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती है
वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा
क्या कहूं? हमेशा की तरह नि:शब्द.

योगेश स्वप्न said...

manobhavna ka sunder shabd chitra.

kshama said...

Bahut anoothi rachana!

महफूज़ अली said...

आपने हमेशा की तरह निःशब्द कर दिया....

श्रद्धा जैन said...

वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा
waah

एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे

kamaal ke shabad
dilfareb nazm

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

one of the best from u...

shikha varshney said...

khubsurat ahsas

venus kesari said...

hameshaa kee tarah behatareen

आनन्द वर्धन ओझा said...

गहरे भावों की गहन कविता... और 'वे ऑफ़ राइटिंग' तो बस कमाल है ! बधाई !!
--आ.

sada said...

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती है
वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा
यह भी सत्य है और
एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे,
बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द भावमय प्रस्‍तुति ।

सागर said...

यह "अब जबकि" ऐसा शब्द है जिसपर मैं अक्सर अटकता हूँ, खटकता हूँ... एक बात फिर भी मैंने इसका प्रयोग किया है...

beharhaal bahut sundar... good one bhai...,

दर्पण साह 'दर्शन' said...

एक शांत सी हवा जो कभी आंधी थी अपने पुराने दिनों को याद करती है ?
और याद करती है बादलों का साथ जिन्होंने उसे नमी दी थी.
बेशक अब शजर नहीं हिलते पर उम्मीद से पलकें बार बार बंद होती हैं और खुलती हैं...

Aarjav said...

जहाँ तुम्हारी नींद हाथ रखती है
वहीँ मैं हो गया हूँ खड़ा
इस उम्मीद में कि
आज नहीं तो कल, तेरा ख्वाब हो जाऊँगा

अच्छी लगी ये पंक्तियाँ !

अल्पना वर्मा said...

जिस्म जीवन का मिल जाए
----
मेरी रिक्तता कों अब
तुम्हारी रूह मिले
-------
मरुस्थल में पानी तलाशता मृग हो जैसे!

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह, प्रेम की पराकाष्ठा तो तानपुरा है | निशब्द पर प्रेमी के हाथ रखते ही बजने को तैयार | गजब की कल्पना | लिखे रखें जी |

सन्ध्या आर्य said...

शाम पीली रौशनी की चादर लपेटे
क्षितिज पर आयी तो
सूरज ने आंखे फेर ली
क्योकि सुरज को
आंखो को चौधिया देने वाली रौशनी से प्रेम था
सूरज को अपनी रौशनी के साथ
सात समन्दर पार जाना था
और शाम साहिल बैठी
उसे निहारती रही
तन्हा........

संजय भास्कर said...

एक बार अपने आगोश दृश्य कर दो मुझे,
बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द भावमय प्रस्‍तुति ।