Thursday, November 19, 2009

तुम्हारा मुबारक जन्म दिन मनाया जाए हर शाख पर!

अभी से कुछ देर बाद जब तारीख बदलेगी
तुम्हारा जन्म दिन हो जाएगा

वक्त के इस लम्हें में
मैं सोंच रहा हूँ
कि भेंट करूँ तुम्हें एक स्वप्न जैसी कविता
तुम्हारे जन्म दिन पर

मैं बाहर जा कर देख आया हूँ
चाँद नही है कहीं आसमान पर
पर कहीं से भी खोज कर
खींच लाना चाहता हूँ कविता में उसे
और बारिश को भी
क्यूंकि हमारी सबसे ज्यादा यादें
चाँद और बारिश को लेकर हैं

इससे पहले कि
मुझे नींद आ जाए
मैं सूरज से भी कह देना चाहता हूँ
कि कल वो खुशनुमा उगे
और सहलाए अपने नाजुक धुप भरे हाथों से तुम्हें

नींद नही आ पायी है
मैं यादों के तहखाने में दूर चला गया था
और रास्ता भूलने का नाटक करके देर तक रहा वहां
मुझे लगा
आज तुम्हारे साथ हीं होना चाहिए मुझे
जब तक कि ये तारीख फ़िर न बदल जाए

भोर हो आयी है,
सूरज गढ़ रहा है
तुम्हारे जन्म दिन कि सुबह
कुम्हार की मिटटी लगी है उसके हाथों में
और मैं अभी भी ढूंढ रहा हूँ
दुनिया की वो सबसे बेहतरीन चीजें
जिससे गढ़ी जा सके एक बिल्कुल नायाब कविता
क्यूंकि उपहार में कवितायें पसंद हैं तुम्हें

इस वक्त जब किरणें उग रही हैं खेतों में
मैं चाहता हूँ
कि धरती पे जितनी भी कोंपलें उगे
उन सब में तुम पनप जाओ
और हमेशा उपजती रहो उनकी मुस्कानों में
और मैं जानता हूँ
यह तुम्हारे लिए कठिन नही है

जब भी उगे कोई कोंपल नाजुक सी
तो वो तुम्हारा जन्म दिन हो
तुम्हारा मुबारक जन्म दिन मनाया जाए हर शाख पर

जन्म दिन मुबारक हो तुम्हें !

( ये १६ नवम्बर कि रात है और सुबह होने तक १७ नवम्बर है )

33 comments:

महफूज़ अली said...

इससे पहले कि
मुझे नींद आ जाए
मैं सूरज से भी कह देना चाहता हूँ
कि कल वो खुशनुमा उगे
और सहलाए अपने नाजुक धुप भरे हाथों से तुम्हें


in panktiyon ne man moh liya....

bahut hi sunder abhivyakti ke saath .... ek sunder kavita...

पी.सी.गोदियाल said...

कविता के बीच में बहुत सुन्दर भाव बिखेरे !

पारूल said...

beautiful !

संगीता पुरी said...

बढिया अंदाज .. जन्‍मदिन मुबारक कहने का !!

sada said...

इससे पहले कि
मुझे नींद आ जाए
मैं सूरज से भी कह देना चाहता हूँ
कि कल वो खुशनुमा उगे

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना जिनसे लिपटे जज्‍बात बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

शायद जन्मदिन पर इससे खूबसूरत उपहार कुछ और हो ही नही सकता है।

आपको पढ़ना सदैव सुखद होता है, रचनायें मन छू लेती है एक एक शब्द जैसे मिश्री की डली की भांति अपनी मिठास घोलता प्रतीत होता है, और अंत में भाव/भावनायें शहद सी लगती हैं।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

पिछले कुछ समय से संपर्क नही रख पाया, क्षमाप्रार्थी हूँ, दिमाग और दिल पर जब पेट हावी हो जाता है तो परिस्थितियों से साम्य बैठाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

Mithilesh dubey said...

बहुत ही सुन्‍दर, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

richa said...

what a b'ful gift and what a b'ful wish !!!

वन्दना said...

इस वक्त जब किरणें उग रही हैं खेतों में
मैं चाहता हूँ
कि धरती पे जितनी भी कोंपलें उगे
उन सब में तुम पनप जाओ
और हमेशा उपजती रहो उनकी मुस्कानों में
और मैं जानता हूँ
यह तुम्हारे लिए कठिन नही है

जब भी उगे कोई कोंपल नाजुक सी
तो वो तुम्हारा जन्म दिन हो
तुम्हारा मुबारक जन्म दिन मनाया जाए हर शाख पर

waah waah waah waah.............kitni tarif karun.kya andaz hai janamdin ki mubarakbad dene ka.........kitna gahre utrne ke baad ye nazm bani hogi........sare jahan mein khoja hoga tab jakar ye lafz,ye ahsaas dil mein utre honge.
itna umda aur beshkimti tohfa bahut kam log kisi ko de pate hain..........bhagwan kare aap hamesha aise hi tohfe diya karein.

श्याम सखा 'श्याम' said...

अद्‌भुत व बहुत सुन्दर ओम जी

अर्शिया said...

आपका कल्पना विधान लाजवाब करता है।
------------------
11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?

raj said...

har kisi ko likh ke de deta hun kavita hi...
esse achha or behter uphaar or kya hoga......

mehangayee aasmaa choone lagi hai in dino......

दिगम्बर नासवा said...

इससे पहले कि
मुझे नींद आ जाए
मैं सूरज से भी कह देना चाहता हूँ
कि कल वो खुशनुमा उगे
और सहलाए अपने नाजुक धुप भरे हाथों से तुम्हें ..

VAAH OM JI ... IS SE NAAYAAB TOHFA AUR KYA HO SAKTA HAI ...
POORI PRAAKRITI KO UTAAR KAR IK NAZN KE GULDASTE MEIN DAAL KAR ADHBUDH BHENT DI HAI AAPNE TO ..... SACH MEIN JANAM DIL KA TOHFA IS SE JYAADA ACHAA NAHI TO SAKTA KISI KE LIYE BHI .....

KAMAAL KI RACHNA HAI ...

अजय कुमार said...

लाजवाब भाव लिये इस कविता का हर लाइन
सुन्दर है
एक सुझाव-गिफ़्ट में ब्लागवाणी का लिंक दे सकते हैं

Dr. Amarjeet Kaunke said...

मैं बाहर जा कर देख आया हूँ
चाँद नही है कहीं आसमान पर
पर कहीं से भी खोज कर
खींच लाना चाहता हूँ कविता में उसे
और बारिश को भी
क्यूंकि हमारी सबसे ज्यादा यादें
चाँद और बारिश को लेकर हैं

ati sundar....prem ko bhent karne ke liye to saari prikirti bhi kam pad jaati hai.....

रश्मि प्रभा... said...

स्वप्निल ख्यालों से बेहतर तोहफा और क्या
हर शाख कूक उठेगी

सागर said...

सच कहूँ... शुरुआत कुछ खास नहीं लगी थी... अमूमन हम ऐसा करना हमेशा से चाहते है और हम जैसे फटेहाल और झोलाछाप कवि सबसे प्रिय के लिए कविता ही रचना श्रेस्कर समझते हैं... (जिसकी २ साल बाद इज्ज़त नहीं होती :)) तो मैं कह रहा था की बड़ी टिपिकल से हो रही थी कविता... किन्तु

पर कहीं से भी खोज कर
खींच लाना चाहता हूँ कविता में उसे


यह आत्मस्वीकृति पर मंतामुग्ध हुआ...

मैं सूरज से भी कह देना चाहता हूँ
कि कल वो खुशनुमा उगे
और सहलाए अपने नाजुक धुप भरे हाथों से तुम्हें

यह बेस्ट लाइन है

आगे तो क़यामत है सर बस गलाकाट क़यामत...

मैंने कमेन्ट बहुत लम्बा किया है और अगर अन्य कमेंट्स को देख कर उसे बेस्ट कहूँ तो पारुल ने जिस अंदाज़ से beautiful लिखा है उससे झलका की कविता शानदार है

कंचन सिंह चौहान said...

vo.... jise aap itni shiddata se janmadin ki shubhkamana de rahe hain ... vo shakhsa jo bhi ho bahut kismata vala hai ki itne khoobsurat alfazo me use janmadin ki mubaraqbaad mil rahi hai.....

bahut khoobsurat ....

shikha varshney said...

इससे पहले कि
मुझे नींद आ जाए
मैं सूरज से भी कह देना चाहता हूँ
कि कल वो खुशनुमा उगे
और सहलाए अपने नाजुक धुप भरे हाथों से तुम्हें
mujhe shabd nahi mil rahe tareef karne ke liye in panktiyon ki...isse khubsurat tohfa nahi ho sakta.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जन्मदिन पर कुछ कहने का इस से बेहतरीन अंदाज़ और क्या हो सकता है ....बहुत बढ़िया लगी यह रचना .शुक्रिया

Rajey Sha said...

अच्‍छे भाव व्‍यक्‍त कि‍ये हैं।

Nirmla Kapila said...

इससे पहले कि
मुझे नींद आ जाए
मैं सूरज से भी कह देना चाहता हूँ
कि कल वो खुशनुमा उगे
और सहलाए अपने नाजुक धुप भरे हाथों से तुम्हे
लाजवाब बहुत बहुत शुभकामनायें और क्या कहूंम

Babli said...

बहुत ही सुंदर, मनमोहक और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ बेहतरीन लगा और दिल को छू गई आपकी ये शानदार रचना! बधाई!

Apanatva said...

bahut hee sunder rachana . aaj koi satve aasmaan par jaroor hoga .

MUFLIS said...

jis shakhs ko
janm-din par aisaa
nayaab tohfaa mil jaaye
use zmaane meiN
aur bhalaa kyaa chahiye hogaa !
Kanvhanji ki baat ko
dohraate hue...
dheroN duaaoN ke saath...
'muflis'

sangeeta said...

भोर हो आयी है,
सूरज गढ़ रहा है
तुम्हारे जन्म दिन कि सुबह
कुम्हार की मिटटी लगी है उसके हाथों में
और मैं अभी भी ढूंढ रहा हूँ
दुनिया की वो सबसे बेहतरीन चीजें
जिससे गढ़ी जा सके एक बिल्कुल नायाब कविता
क्यूंकि उपहार में कवितायें पसंद हैं तुम्हें


om ji,
bahut sundar bhavuk man se likhi gayi kavita ka uphaar ...zaroor pasand aaya hoga....khoobsurat abhivyakti ke liye badhai

शरद कोकास said...

अच्छी अभिव्यक्ति है ।

गौतम राजरिशी said...

आज बस एक शब्द

"खूबसूरत"

Dr Ankur Rastogi said...

Phir se ek aur heera......
Om ji hum to aapke fan ho gaye hai.
aur woh jo koi bhi hain, jinka 17th sept ko janamdin tha....bahut lucky hain jo unhen aisi khoobsoorat kavitayein uphaar mein milti hain.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

पता नहीं क्यों, आपकी कवितायें पढने के बाद कुछ कहना ही नहीं चाहती...बस महसूस करना चाहती हूं.

Dr Ankur Rastogi said...

और सहलाए अपने नाजुक धुप भरे हाथों से तुम्हें

आज तुम्हारे साथ हीं होना चाहिए मुझे
जब तक कि ये तारीख फ़िर न बदल जाए

इस वक्त जब किरणें उग रही हैं खेतों में

सूरज गढ़ रहा है
तुम्हारे जन्म दिन कि सुबह
कुम्हार की मिटटी लगी है उसके हाथों में


Mein decide nahin kar pa raha sabse khoobsoorat bimb kaunsa hai????

Aap blog jagat ke gulzar ho.

Apoorv said...

और हाँ...
ऊपरवाला मुहूर्त निकाल के अपने हाँथों से विदा कर भेजता होगा उस शख्स को इस जमीं पर..जिसकी किस्मत के केक पे स्वप्न जैसी इन कविताओं की कैंडल्स लगते हैं...

水煎包amber said...

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