Sunday, March 21, 2010

उल्के

आजकल
ये तारा
टिमटिमाता रहता है अकेला

अभी कुछ रोज पहले तक
देखता था इसे
चाँद के बहुत क़रीब

उसकी
मुलायम चाँदनी में नहाते हुए

डर है
चाँद जब तक लौट कर आए
ये तारा
कहीं उल्के में न बदल जाए

13 comments:

अमिताभ मीत said...

अच्छा है ...

गिरिजेश राव said...

डरो नहीं - प्रेम जीवित रहेगा।
मृत्यु के बाद भी।

बिछड़ने के बाद भी।

तारे के उल्का हो जाने के बाद भी।
चाँद तारों के पार प्रेम जीवित रहेगा -

मैं मैं न रहूँगा

वह वह न रहेगी।

..बहुत दिनों बाद जब याद करेंगे

प्रेम फैलेगा मुलायम चाँदनी बन

याद को आकार देते हुए -
अँधेरे में आकार कहाँ होते हैं?

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

this is awesome...

बेचैन आत्मा said...

जितना प्यारा
डर
उतना अच्छा
उत्तर
गिरजेश राव
बढ़ा देते हैं
कविता का भाव
भाव?
मूल्य नहीं....
संवेदना का विस्तार
आखिर इसी से तो बढ़ता है
परस्पर प्यार!
,,,अच्छी कविता के लिए बधाई.

M VERMA said...

डर है
चाँद जब तक लौट कर आए
ये तारा
कहीं उल्के में न बदल जाए
चाँदनी में नहाया हुआ तारा जब उल्का बनेगा तो उसमे वेग आ जायेगा. वह खुद ही चाँद की रोशनी तक पहुँच जायेगा.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत जायज डर. सुन्दर कविता.

kshama said...

Hameshaki tarah..sundar rachana!

डॉ. मनोज मिश्र said...

achhee rachna.

सुशीला पुरी said...

आपकी कल्पना बिल्कुल अछूती है ,अभिनव है .

धीरज शाह said...

चाँद का अपना अन्दाज है।
अति सुन्दर...

सागर said...

थोड़ी सी तकलीफ है ऐसा लग रहा है की आप फॉर्म में नहीं चल रहे... यहाँ से बहुत उम्मीदें हैं और कविता में निराश होना सीखा नही मैंने...

अपूर्व said...

हम जानते है ना कि जब यह तारे चाँद के बेहद करीब दिखते हैं तो हकीकतन उससे बहुत दूर, बहुत-बहुत दूर होते हैं..इतने ज्यादा कि चाँद उन तारों के मुकाबले हमसे ज्यादा करीब होता है..सो यह अकेलापन तारों की किस्मत है..और चांदनी छलावा...फिर भी तारे टिमटिमाते रहते हैं..
सो फिक्र मत कीजिये, कोई तारा उल्का मे नही बदलेगा...

सन्ध्या आर्य said...

चाँद तो आता है
थोडे बादल लिये
और बरस भी जाता है
सूरज भी सुबह को
उगा देता है
दिन की फसल भी
लहलहा जाती है
शाम कही साहिल पर
इंतजार करती दिख जाती है
जिन्दगी की!