आजकल
ये तारा
टिमटिमाता रहता है अकेला
अभी कुछ रोज पहले तक
देखता था इसे
चाँद के बहुत क़रीब
उसकी
मुलायम चाँदनी में नहाते हुए
डर है
चाँद जब तक लौट कर आए
ये तारा
कहीं उल्के में न बदल जाए
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कुछ शब्द जो मेरे मौन के खाली घर में आते हैं उन्हें मैं आवाज की पनाह में लाने की कोशिश करता हूँ . बस यही करता रहा हूँ .
13 comments:
अच्छा है ...
डरो नहीं - प्रेम जीवित रहेगा।
मृत्यु के बाद भी।
बिछड़ने के बाद भी।
तारे के उल्का हो जाने के बाद भी।
चाँद तारों के पार प्रेम जीवित रहेगा -
मैं मैं न रहूँगा
वह वह न रहेगी।
..बहुत दिनों बाद जब याद करेंगे
प्रेम फैलेगा मुलायम चाँदनी बन
याद को आकार देते हुए -
अँधेरे में आकार कहाँ होते हैं?
this is awesome...
जितना प्यारा
डर
उतना अच्छा
उत्तर
गिरजेश राव
बढ़ा देते हैं
कविता का भाव
भाव?
मूल्य नहीं....
संवेदना का विस्तार
आखिर इसी से तो बढ़ता है
परस्पर प्यार!
,,,अच्छी कविता के लिए बधाई.
डर है
चाँद जब तक लौट कर आए
ये तारा
कहीं उल्के में न बदल जाए
चाँदनी में नहाया हुआ तारा जब उल्का बनेगा तो उसमे वेग आ जायेगा. वह खुद ही चाँद की रोशनी तक पहुँच जायेगा.
बहुत जायज डर. सुन्दर कविता.
Hameshaki tarah..sundar rachana!
achhee rachna.
आपकी कल्पना बिल्कुल अछूती है ,अभिनव है .
चाँद का अपना अन्दाज है।
अति सुन्दर...
थोड़ी सी तकलीफ है ऐसा लग रहा है की आप फॉर्म में नहीं चल रहे... यहाँ से बहुत उम्मीदें हैं और कविता में निराश होना सीखा नही मैंने...
हम जानते है ना कि जब यह तारे चाँद के बेहद करीब दिखते हैं तो हकीकतन उससे बहुत दूर, बहुत-बहुत दूर होते हैं..इतने ज्यादा कि चाँद उन तारों के मुकाबले हमसे ज्यादा करीब होता है..सो यह अकेलापन तारों की किस्मत है..और चांदनी छलावा...फिर भी तारे टिमटिमाते रहते हैं..
सो फिक्र मत कीजिये, कोई तारा उल्का मे नही बदलेगा...
चाँद तो आता है
थोडे बादल लिये
और बरस भी जाता है
सूरज भी सुबह को
उगा देता है
दिन की फसल भी
लहलहा जाती है
शाम कही साहिल पर
इंतजार करती दिख जाती है
जिन्दगी की!
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