Sunday, May 24, 2009

कैक्टस से बढ़ कर है प्यार!

गर्मियों के मौसम आ गए,
आँगन में
देर तक सीधी तेज धूप गिरती है

नमी के कतरे
एक-एक कर उडे जा रहे हैं
और जल्द हीं खत्म हो जाने को हैं

आँगन की मिटटी
और रेत के बीच के सारे फर्क
लू के थपेडे बहा ले गए हैं

वो भी अपना सारा बादल समेट कर
आसमान के दूसरे कोने में चली गई है

पर आँगन में, उगाया था
जो पौधा प्यार का
अभी भी सूखता नही

जाने कहाँ से लेता है नमी
और कैसे बचाता है लू के थपेडों से ख़ुद को

सूखे रेतीले मौसमो के थपेडो में
टिके रहने के नजरिये से
कैक्टस से बढ़ कर है प्यार!

12 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

आँगन की मिटटी
और रेत के बीच के सारे फर्क
लू के थपेडे बहा ले गए हैं
behad khoobsurat

vandana said...

sach kaha .........pyar to pyar hi hota hai.......sabse badhkar.

raj said...

pyar har mousam me zinda rahta hai...zinda rahne ka sleeka kactus se bad ke or kon sikha sakta hai...koee mousam ho khila rahta hai...

AlbelaKhatri.com said...

waah waah
omji, bahut bahut umda rachnaon ki liye aapko
HARDIK BADHAI

संध्या आर्य said...

यह कविता लगता है प्यार के साकारात्मक और नाकारात्मक दोनो ही पक्छ को दिखाती हुई प्रतित होती है ..............बेहद भावपूर्ण रचना.........यही तो आपकी लेखनी की विशेशता है ..............कुछ लोगों की जिन्दगी ऐसी ही होती है.

SWAPN said...

पर आँगन में, उगाया था
जो पौधा प्यार का
अभी भी सूखता नही

जाने कहाँ से लेता है नमी
और कैसे बचाता है लू के थपेडों से ख़ुद को

wah om ji , kya abhivyakti hai. umda! badhai.

संगीता पुरी said...

सुंदर अभिव्‍यक्ति ..

ओम आर्य said...

सब लोगों का तहे दिल से शुक्रिया. आप सब की प्रतिक्रिया लिखने का हौसला बढा देती है.

ओम आर्य said...
This comment has been removed by the author.
श्याम कोरी 'उदय' said...

... दमदार रचना ।

नीरज गोस्वामी said...

क्या खूब लिखा है आपने...भाई वाह...शशक्त रचना...
नीरज

दिगम्बर नासवा said...

कैक्टस की तरह कुछ इंसान भी खड़े रहते हैं ..................प्यार भी इसी तरह से हरा भरा रहे तो क्या बात है.........
आपकी रचना बेहद लाजवाब है ......... ताजा