Wednesday, May 27, 2009

तुझे देखा है कई बार ख्वाब में

तुझे देखा है कई बार ख्वाब में
सोचता हूँ कोई शेर लिखू तेरे किताब में

बडी देर तक आंखे रही बेचैन
जो छिपा लिया तुने चेहरा हिजाब में

जाने कब तक लहरे रक्श करती रही
जाने किसने मिला दी समंदर शराब में

तुमने तो खोल दी अनजाने ही में आंखो की धार को
तुम्हे क्या पता कौन बह गया उस शैलाब में

हम पीते है, हमे मालूम है
कितना तो नशा है उनकी नजर में और कितना शराब में

करे जो कोई सवाल आडे- तिरछे तुमसे तो
कह देना उनसे कि तुम रहते हो खुदा के रुआब में

6 comments:

SWAPN said...

तुमने तो खोल दी अनजाने ही में आंखो की धार को
तुम्हे क्या पता कौन बह गया उस शैलाब में

badhia hai om ji , nikhar aa raha hai.

AlbelaKhatri.com said...

bahut achha omji,
badhai!

Udan Tashtari said...

जाने कब तक लहरे रक्श करती रही
जाने किसने मिला दी समंदर शराब में

-बेहतरीन!

संध्या आर्य said...

तुमने तो खोल दी अनजाने ही में आंखो की धार को
तुम्हे क्या पता कौन बह गया उस शैलाब में

ऐसा लगता है कि आप ख्वाब मे नही बल्कि हकिकत मे देखा है उसे...........गुस्ताखी माफ............ पूरी तरह से डुबकर लिखते हो मियाँ..........लाजबाव...... यह कविता मानो जीवित कर देता है ख्वाब को.

रंजना said...

तुमने तो खोल दी अनजाने ही में आंखो की धार को
तुम्हे क्या पता कौन बह गया उस शैलाब में !!!

Waah ! Waah ! Waah !

lajawaab !

दिगम्बर नासवा said...

हम पीते है, हमे मालूम है
कितना तो नशा है उनकी नजर में और कितना शराब में

सही कहा ओम जी..........पीने वाला ही जानता है आँखों का और शराब का नशा.............
लाजवाब लिखा है