Friday, May 22, 2009

जो बह गये पानी

मिल बैठ कर
बात कर लेते हैं
जब मन, भरा बादल हो जाता है
साथ में बरसना भी हो जाता है कभीकभार
जब पुरवइया के झोंके विरहा गाते हैं

किसी पुराने समय के हिसाब में
खुशियों को चुनौती दे दी गई
मार दी गई चुन चुन कर
उनकी किलकारियाँ
खौफ की डुगडुगी
डंके की चोट पर बजायी गयी
लहू बहाये गये

घर के दीवारो से लग कर सिसकियाँ बोलती रहीं
पर कहीं कोई कान नही हुआ मौजूद

धरती के सीने पे दर्दो के चकत्ते बडे होते गये
चक्कर खा कर
गिरते रहे हौसले और विश्वास के वजूद
और एक समय तक बंधे हुए सारे बांध टूट गये

जो बह गये पानी
उन्हीं की याद में वे
मिल बैठ कर बात कर लेते हैं
और बरस लेते हैं
जब मन भरा बादल हो जाता है।

4 comments:

SWAPN said...

om ji , aapki kavita kahne ka niraala hi andaaz hai, ye sach hai ki aapki kavita samajhne ke liye kam se kam teen baar padhna padta hai. bahut gahrai men likhte hain.

जो बह गये पानी
उन्हीं की याद में वे
मिल बैठ कर बात कर लेते हैं
और बरस लेते हैं
जब मन भरा बादल हो जाता है।

badhai.

अनिल कान्त : said...

bahut achchhi rachna hai aapki ye

Udan Tashtari said...

बहुत खूब..क्या बात है!!

संध्या आर्य said...

घर के दीवारो से लग कर सिसकियाँ बोलती रहीं
पर कहीं कोई कान नही हुआ मौजूद

धरती के सीने पे दर्दो के चकत्ते बडे होते गये
चक्कर खा कर...........

dardbhari jindgi ki hakikat byaan karati ye panktiyaan .......na jaane kitanaa dard samete huye hai ......jise padhkar .......
मन, भरा बादल हो गया.