Tuesday, October 13, 2009

तब आखिरी बार उसकी पीठ देखी थी !

उधेड़ गयी वो सीवन
एक धागा था बांधे हुए
गिरहें खुल गयीं
और फ़िर उधड़ते चला गया धागा

रिश्ते का हिज्जे बदल गया
एहसासों का जायका भी,
उसके साथ साथ

बंद हो गयी सारी नसें आँसुओं वाली

ना संभाल कर रखने को छोड़ा
कोई निशान
ना यादों के लिए कोई लकीर,
जिसे पकड़ के कभी दुबारा लौटना हो सके

एक लम्हा था
जो पलटा तो
एक तरफ कुछ कागजात थे हमारे दस्तख़त वाले
और दूसरी तरफ
उसकी पीठ जा रही थी.

29 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

वाह, ओम जी कितना खूबसूरत ज़ज्बात उसके बाद प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति...भाई कभी कभी तो मुझे उस वक्त आपकी कविता समझ में नही आती और एक बार से अधिक पढ़ने पर जाकर आभाष होता है की हाँ क्या चीज़ लिखते है आप....बहुत ही लाज़वाब......बढ़िया कविता...बहुत बहुत बधाई

परमजीत बाली said...

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना है।कहीं बहुत गहराई से शब्द निकले हैं।बधाई स्वीकारें।

चंदन कुमार झा said...

बहुत ही सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति । आभार

M VERMA said...

सीवन तो फिर भी दुबारा टांकी जा सकती थी.
बहुत मार्मिक एहसास परोसा है आपने. रिश्तो के बीच 'दस्तख़त वाले' कागजो ने अक्सर तूफान उठाया है.
बहुत खूब

वाणी गीत said...

उसकी पीठ जा रही थी ...
मार्मिक अभिव्यक्ति ..!!!

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा..मार्मिक अभिव्यक्ति!!

Mishra Pankaj said...

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना है।
बधाई स्वीकारें

mehek said...

एक तरफ कुछ कागजात थे हमारे दस्तख़त वाले
और दूसरी तरफ
उसकी पीठ जा रही थी.
bhavpurn rachana badhai

Vijay Kumar Sappatti said...

om bhai

mian nishabd hoon .. aakhri paragraph me aapne to itna jhakjhor diya hai ki main kya kahun .. man ruka hua hai abhi bhi usi mod par jahan kuch kaagaj the aur uski peeth.....
alag hona kitna dukhdaayi hota hai , ye aapki rachna me ubhar kar aaye hai ..

aapki lekhni ko salaam , aapko salaam..

i am speachless of the end of this poem bhai ..

badhai sweekar kare.

dhanywad.

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

सागर said...

अंतिम दो पैरे बेहद खूबसूरत है... (मुआफी आपके सच्चे जज्बात को दुखा रहा हूँ, क्यों की जानता हूँ यह सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखे गए हैं)

... बड़ी दिमाग वाली बात कर दी आपने... लगता है हिंदी में संक्षेपण करना सीख गए हैं आप...

सागर said...

देखिये चिठ्टा चर्चा में भी बात आई है.. यह दो पैरे याद रह जाने वाली हैं... मैं फिर एस एम् एस करूँगा...

raj said...

rishte ka hijja badal gya or jzuba ka jayka bhi uske sath ...fir bhi zuba pe achhe dino ka jayka rakhna...kuchh kagjat the....rifakate koee zanzeere panv nahi..na chal sako to bicchad jao dosto ki tarah...moun ke ghar se kitna dard bahta hai..lagta hai koee smunder aapke kaleen tak aa ke lout gya....

वन्दना said...

एक लम्हा था
जो पलटा तो
एक तरफ कुछ कागजात थे हमारे दस्तख़त वाले
और दूसरी तरफ
उसकी पीठ जा रही थी.

in panktiyon ne hi sari dastan bayan kar di.........behad marmik.

रश्मि प्रभा... said...

rishte ka hijje badal gaya,yahi sach hai......bahut badhiyaa

महफूज़ अली said...

एक लम्हा था
जो पलटा तो
एक तरफ कुछ कागजात थे हमारे दस्तख़त वाले
और दूसरी तरफ
उसकी पीठ जा रही थी.

ab to nishabd hoon.........

डॉ .अनुराग said...

one of your best creation!!!!!!!

कंचन सिंह चौहान said...

aksar aap ki kavitaoN par comment karne ko shabda nahi milte

वन्दना अवस्थी दुबे said...

रिश्तों की सीवन यदि उधड गई हो तो फिर उसे सिलने की कोशिश की भी नही जानी चाहिये..दुबारा सिले कपडे तो पहने जा सकते हैं लेकिन रिश्ते नहीं....

sada said...

बहुत ही भावपूर्ण प्रस्‍तुति ।

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .

अम्बरीश अम्बुज said...

rishton mein kagajat ki baat aur uske baad ki vyatha ko antim ki do panktiyon mein itne sankshep mein likh kar itni baatein kah di.. bahut khoob om bhai...

अर्कजेश said...

वाकई उस लमहे को जीवन्त कर दिया है आपने ।

खासकर - एक तरफ कुछ कागजात थे हमारे दस्तख़त वाले
और दूसरी तरफ उसकी पीठ जा रही थी ।

बहुत ही मार्मिक है !

दिगम्बर नासवा said...

बहोत ही खूबसूरत लिखा है ओम जी हमेशा की तरह ........... सच है एक सीवन के साथ रिश्ते उघडते आते हैं ........ बस गुज़रती हुयी धुल ही नज़र आती है ........

pukhraaj said...

हाथ छुटें भी तो रिश्ते नहीं तोडा करते
वक़्त की शाख से लम्हे नहीं तोडा करते ...

जगजीत सिंह की गयी ग़ज़ल याद आ गयी ..... छूटते रिश्तों को बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है आपने आज .....

kshama said...

Ekek tanka, kar dard udhadtaa gaya..

Apoorv said...

भई बड़ी ही मार्मिक कविता हो गयी यह आपकी..और दुखांत..टाइटिल ही हृदयविदारक सा है.
कुछ लिख नही पा रहा हूँ और..बस एक आशा मेरी ओर से उस धागे के सदके..जिसका शायद कोई सिरा मिले कहीं पर..कभी..क्या पता!!

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओम भाई,
कविता मन को छू गई है ! सुन्दर भावाभिव्यक्ति!! बधाई !!
सप्रीत--आ.

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

खूबसूरत ज़ज्बात