Tuesday, October 27, 2009

कब आ रही हो !!!

जब भी चली जाती हो तुम मायके
मैं एक एक कर
याद करता हूँ
अपनी सारी पुरानी प्रेमिकाएं

निकालता हूँ
कवर से गिटार
और रात देर तक उसके तारों को
छूते हुए कोशिश करता हूँ
महसूसना उन पुरानी प्रेमिकाओं को

कभी पार्क की
फिसल पट्टी पे लेट कर
आधा चाँद देखते हुए
सोंचता हूँ अधूरे प्रेमों के बारे में
और 'रात को रोक लो' वाला गाना गाता हूँ

निकालता हूँ
अपनी पुरानी लिखी कवितायें
एक दो पढता हूँ
और फ़िर रख देता हूँ
उनमें गंध आ गई है वैसी जैसी
बहुत दिन से पेटी में पड़े
पुराने कपडों में हो जाती है

और ये सब कर के
जब थक जाता हूँ
और हो जाता हूँ उदास
बनाता हूँ
मग भर कड़क काली चाय
और तुम्हें याद करते हुए पीता हूँ

और अगली सुबह
तुम्हें फोन करके पूछता हूँ
कब आ रही हो !!!


38 comments:

अजय कुमार said...

बेइंतेहा मोहब्बत में भीगी हुयी बातें
बहुत खूब

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रूमानी रचना ..सुन्दर भाव ...

M VERMA said...

यादों के सहारे ज़िन्दगी तो नही चलती
और शायद
उनमें गंध आ गई है वैसी जैसी
बहुत दिन से पेटी में पड़े
कहना ही पडेगा 'तुम कब आ रही हो'

दिगम्बर नासवा said...

क्या खूब कहा है Om जी ........... सुबह होते ही फ़ोन karta हूँ ........... सच में दिल नहीं लगता ..... कुछ भी कर लो उनकी याद आती है .......... achhaa लिखा है ..........

सागर said...

तुम्हारे उतारे हुए दिन... टंगे हैं लॉन में अब तक...

... अपनी किस्मत ही ऐसी है... ऐसे ही जीना होगा... आप तो फिर भी खुशनसीब हो ढेरों प्रेमिकाएं हैं...:):):)

देखूं जरा मेरा मेरा माउथ ओरगन कहाँ है... धूल जमी है उसपर...

अनिल कान्त : said...

क्या क्या एहसास लिख देते हो ओम भाई
वाह !!

बेहद रूमानी

Dr. Smt. ajit gupta said...

ओम भाई, प्रेमिकाएं मत कहो, बस कहो कि जिन्‍हें मैं टापता था। कोई साथ नहीं आयी बस आयी तो मेरी पत्‍नी और आज वो भी मैके में। हा हा हा हा।

योगेश स्वप्न said...

wah om ji,
shaam ka bhoola subah ko ghar aa gaya,
humko to ue rang tumhra bha gaya.

badhia rachna.

AlbelaKhatri.com said...

भाईजी कविता तो कमाल है

लेकिन इतनी चतुराई से हमें क्यों बता रहे हैं कि आपकी बहुत सारी प्रेमिकाएं हैं .........भाई किसी को इर्ष्या होगई तो ?

प्यारी कविता के लिए धन्यवाद !

पदमजा शर्मा said...

यादें कभी जाती नहीं . चोट लगती है तो समय के साथ दर्द चला जाता है मगर निशान तो रह ही जाते हैं . पर दांपत्य प्रेम सब से उँचा है . इसीलिए पूछना पड़ता है " कब आ रही हो ?"

kshama said...

Taqreeban sabhi rachnayen dard me doobee huee hoti hain..lekin phir bhi har baar naye tareeqe se bayaan hoti hai..

mujhe ek purana geet yaad aa gaya," Phool tumhen bheja hai khatme.." Isme chand panktiya thee,"jab chaand hamare angnaa utre, koyi to aisee rain mile..""Nain bichhaye baithe hain, kab aaoge, khat likh do.."

Ab to sab sms ya e-mail ke zariye hota hai..wo khaton ka roomani andaz chala gaya..

पी.सी.गोदियाल said...

जब भी चली जाती हो तुम मायके
मै एक एक कर
याद करता हूँ
अपनी सारी पुरानी प्रेमिकाए

वाह !

हा-हा, मुझे तो भाई साहब आपकी मार खाने की मनसा दीख रही है !

महेन्द्र मिश्र said...

वाह भाई बहुत बढ़िया.....

Apanatva said...

us phone call ne bacha liya aapko .
mai bhee Dr Ajit gupta jee ke vicharo ke sath sahmat hoo .

Dr Ankur Rastogi said...

Tamaam umr tera intezaar humne kiya,
Is intezaar mein kis kis se pyaar humne kiya.....

ktheLeo said...

Honest and innocent confessions!Great reading!

विनोद कुमार पांडेय said...

ओम जी, सबसे पहले माफी चाहता हूँ कि आज कल थोड़ी व्यस्तता के चलते आपकी कविताओं को देर से पढ़ पा रहा हूँ.और दूसरी बात इस कविता के बारें में की किसी को याद करने का बहुत बढ़िया तरीका ढूढ़ निकाला आपने..बढ़िया भाव संजोया है नये तरह की सुंदर कविता...धन्यवाद

अम्बरीश अम्बुज said...

कभी पार्क की
फिसल पट्टी पे लेट कर
आधा चाँद देखते हुए
सोंचता हूँ अधूरे प्रेमों के बारे में
और 'रात को रोक लो' वाला गाना गाता हूँ
bahut sundar..

Satya.... a vagrant said...

BAHUT SUNDAR..
BAHUT BAHUT BAHUT YATHARTH PARAK KAVITA . YA SHAYAD YE KAVITAQ NAHI HAI. EH SACHHAYI.
SADHUVAAD.

SATYA VYAS

Mishra Pankaj said...

ॐ भाई मस्त कविता है बधाई

Apoorv said...

माई गॉड!! बड़ी लिबरल सी और दिल्नशीं बातें लिख दी आपने तो यहाँ!! कितनी अपनेपन सी लगती है..जबकि यहाँ न तो कोई मायके जाने वाला है और न गिटार के तारों पर अन्छुई छुवन..हाँ कड़क चाय का प्याला जरूर साथ देता है..बेखयाली का ;-)

और ’रात को रोक लो‘ वाला गाना!! उफ़्फ़..कुछ बात तो होगी उसमे!!!

अफ़सोस के सिर्फ़ एक शाम का ही जिक्र हुआ है अभी बस..और प्रेमिकाएं बाकी हैं..और पुरानी कविताओं की डायरी भी!!

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओम भाई,
आपके इस रूमानी अंदाजे-बयाँ के क्या कहने ! मुझे तो पेटी में रखे कपडों की गंध ने मदहोश कर दिया ! कहाँ से लाते है ऐसे खयालात ? ऐसे उपमान ?? बधाई !
सप्रीत--आ.

Dr. Amarjeet Kaunke said...

ओम भाई ! यह तो अपने मेरी ही कविता
लिख डाली...मैं भी यही करता हूँ........

Dhiraj Shah said...

भाव-भीनी प्रस्तुति.. प्रेम की।

वाणी गीत said...

उम्दा ख्याल ...बेहतरीन रचना !!

sada said...

बहुत ही उम्‍दा प्रस्‍तुति ।

Nirmla Kapila said...

ओम जी संवेदनाओं को शब्दों मे उकेरना और सुन्दर कृति की रचना कर देना कोई आपसे सीखे बहुत सुन्दर रुमानी रचना है शुभकामनायें

गौतम राजरिशी said...

रात को रोक लो...रात साथ है और जिंदगी बाकी तो नहीं...

ओम, एक तो ऐसी लिखो आप जो इधर सीने में न उतरे...जिसे मैं अपना-सा महसूस न करूं...जिसपर मुंह बिचका कर चला जाऊं कि हुंह!

ये तो मेरी बातें थी, ये तो मुझे लिखना था, इसे तो मुझे गुनगुनाना था...

इजाजत दें कि इस कविता का इस्तेमाल करूं{आपके नाम के साथ}!

sangeeta said...

बहुत खूब.....भूली बिसरी सी यादें...

और फिर यथार्थ ....सुन्दर लेखन

वन्दना said...

waah waah om ji.........aaj to alag hi andaaz raha aur bahut hi badhiya raha..........ek kasak ko bahut hi sundar rang mein rang diya..........badhayi

महफूज़ अली said...

मैं एक एक कर
याद करता हूँ
अपनी सारी पुरानी प्रेमिकाएं

bahut sahi.......... main to soch raha tha ki ..... mujhe hi apni purani premikaayen yaad karni padtin hain..... heheehehheheheeheheeee....

waise aapne bahut hi doob ke yeh kavita likhi hai....bahut hi sunder ban padi hai..... ek ek alfaaz bol rahen hain..... phir se ek baar kah raha hoon ki..... aaap......

wahi likhte hain jo main sochta hoon...... ab soch raha hoon ki main apni soch ko patent karwa loon......... hhhihhiiihihiii

is sunder kavita ke liye bahut bahut badhai....

रश्मि प्रभा... said...

waah.......kadak chay ke saath vartmaan ka rishta rumani ho uthta hai

रंजना said...

हा हा हा हा....बहुत खूब....

कड़वी चाय पीकर पत्नी की याद आना.....वाह !!!

यह रचना आपने पत्नीश्री को सुनाई की नहीं ????

आपलोगों के मीठी तकरार की कल्पना से मेरे होंठों पर मुस्कान बिखर गयी है...

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

मैं इसे कविता नही एक हलफनामे के रूप में लूंगा आपने किस तरह से मेरी, हमारी बातें खोल के रख दी।

एक प्यारभरी बहुत ही सुन्दर रचना जो पढ़ी कम महसूसी ज्यादा गई।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

यदि संभव हो तो अपना कोई और कान्टेक्ट नम्बर दीजियेगा, आपसे बतियाने का मन हो रहा है।

JHAROKHA said...

सुन्दर यादों को खूबसूरती के साथ कविता में पेश किया है आपने।
पूनम

ओम आर्य said...

कोई रचना तब सफल हो जाती है जब पाठक उसे अपनी जिन्दगी से जोड़ पाता है. कई मित्रों ने इस कविता को अपनी अनुभूति बताई है, इस अर्थ में यह सफल है.

मुकेश जी, यह मेरा सुभाग्य है कि आप मुझे बात करना चाहते हैं. मैं मेरा मोबाईल नम्बर है: 91 99280 39210

raj said...

gujar jao bach kar harek yaad se,
koee shaam yuhi gujara karo.
ye dhalte hue chaand ki bebasi,
tumhare liye hai nzaara karo.....

शरद कोकास said...

धन्य है आप .. पत्नियो.. मतलब पत्नी के लिये आजकल कौन कविता लिखता है