Monday, October 5, 2009

निष्ठुर

भूख थे वहाँ कतार में खड़े
और
पेट उनके, आग में पक रहे थे

चेहरे पहले लार लार हुए
फिर सूख कर लटक गये
इंतेज़ार में,
जीभ पपड़ीदार हुए फिर
आस में भोजन के
मगर शर्म नही आयी उसे.

वो भीतर
आसन पे विराजमान
अपने
दप-दप करते चेहरे के साथ
मजे से
चढ़ावे खाता रहा.

31 comments:

Pankaj Mishra said...

ओम भाई मस्त है भाई आपने तो गजब की कविता लिखी है
नमस्कार

raj said...

mujhe pata nahi ki kavita kis sandarbh me likhi gyee hai par kisi tarah ki aas me koee sharam nahi hiti...etna janti hun...sabko alag alag cheejo ki bhukh hai or wo pana chahte hai..pet ki bhookh ka andaza apki kavita se laga sakti hun....

कविता said...

Apna apna bhagya.
Sundar bhaav.
Think Scientific Act Scientific

kshama said...

Khaamosh kar diya aapne...yahee aapkee zabadast taqat hai..hamesha 'gagar me sagar' bhar dete hai...!

सागर said...

आपकी नयी तस्वीर बहुत डरावनी है... कहती है बिना कमेन्ट दिए मत जाना ! कैसा खौफ है यह... :)

सागर said...

आपकी नयी तस्वीर बहुत डरावनी है... कहती है बिना कमेन्ट दिए मत जाना ! कैसा खौफ है यह... :)

वन्दना said...

ek katu satya ko ujagar karti rachna.

महफूज़ अली said...

waaqai mein ek dar sa dikhta hai is kavita mein........

दप-दप करते चेहरे के साथ
मजे से
चढ़ावे खाता रहा... katu vyang....


bahut achcha likha hai aapne

विनोद कुमार पांडेय said...

Om ji, Thoda hatkar par abhivyakti wahi puarni wali. behtareen...badhayi..sundar bhav..

अभिषेक ओझा said...

'निष्ठुर' ही उपयुक्त शीर्षक हो सकता था इसके लिए !

अल्पना वर्मा said...

बहुत सही kahaa!

कटाक्ष करती कविता!

ambuj said...

katu par satya

रश्मि प्रभा... said...

shaandaar abhivyakti

Kusum Thakur said...

पूर्ववत अच्छी अभिव्यक्ति . आपको बधाई !

Dr Ankur Rastogi said...

Der tak yaad rehne waali rachna. Badhai.

Apanatva said...

omji bahut hee gaharee chap chodane walee rachana rahee ye . Badhai

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत भावुक कर देने वाली रचना सही है....

pukhraaj said...

दो बहने हैं गरीबी और भूख ...बचपन से साथ निभाती आई हैं ...एक को मार दो दूसरी खुद बखुद मर जायेगी

योगेश स्वप्न said...

ek misaal abhivyakti, badhaai.

Apoorv said...

ओम भाई आपका यह नया अन्दाज तो झकझोर गया और बड़ा बेहतरीन और सामयिक लगा..
पेट उनके, आग में पक रहे थे
भूख से बड़ी आग क्या होगी..जिसमे मिट्टी के जिस्म पकते नही झुलस जाते हैं..
बीच के स्टैन्जा का चित्र इतना भयावह और सजीव लगा कि पाण्डेय जी की हल्दीघाटी याद आ गयी..
और यहाँ भीतर बैठे ’वो’ की व्यंजना बहुत सशक्त और धारदार लगी..यह दान पर चलने वाले पूज़ाघरों की व्यवस्था भी हो सकती है, टैक्स पर चलने वाले पार्लियामेंट की भी और ठगी पर चलने वाले बाजार की भी..
बहुत खूब..नयी नयी फ़्रीक्वेन्सीज देखने को मिल रही हैं आपकी

Apoorv said...

हाँ प्रथम पंक्ति मे ’भूख थी’ प्रयोग किया है आपने या ’भूखे थे’..थोड़ा कन्फ़्यूज कर गया

ushma said...

ॐम जी ! आपकी कविताओं ने तो ,
परसाई जी की कविताओ की याद दिला दी !
बहुत मार्मिक व्यंग्य रचनाये हैं ! आभार !

मीनू खरे said...

बहुत मार्मिक व्यंग्य रचनाएँ.

Udan Tashtari said...

बहुत जबरदस्त/ उम्दा रचना.

सुशीला पुरी said...

गज़ब.........

दर्पण साह "दर्शन" said...

aaj us kathit bhagvan ko bhi nahi chora?
andaaz nirala hai !!

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

वाणी गीत said...

मजे से चढावे खाता रहा ..निष्ठुर कविता ..!!

दिगम्बर नासवा said...

सच में मंदिर मैं बैठा भगवान् कभी कभी बहुत निष्ठुर हो जाता है .......... पर उसकी चाल को कौन समझ सकता है .....

sa said...
This comment has been removed by a blog administrator.
水煎包amber said...

cool!very creative!AV,無碼,a片免費看,自拍貼圖,伊莉,微風論壇,成人聊天室,成人電影,成人文學,成人貼圖區,成人網站,一葉情貼圖片區,色情漫畫,言情小說,情色論壇,臺灣情色網,色情影片,色情,成人影城,080視訊聊天室,a片,A漫,h漫,麗的色遊戲,同志色教館,AV女優,SEX,咆哮小老鼠,85cc免費影片,正妹牆,ut聊天室,豆豆聊天室,聊天室,情色小說,aio,成人,微風成人,做愛,成人貼圖,18成人,嘟嘟成人網,aio交友愛情館,情色文學,色情小說,色情網站,情色,A片下載,嘟嘟情人色網,成人影片,成人圖片,成人文章,成人小說,成人漫畫,視訊聊天室,性愛,成人圖片區,性愛自拍,美女寫真,自拍