Monday, October 26, 2009

बडा इंतज़ार रहता है

दिल से चले गये दर्दो का
जाने क्यो बडा इंतज़ार रहता है

और जो बच गये हैं बैठे हैं जाम लेके
होश इनको जरा ना-गवार रहता है

आजकल अखबार का समाचार पढते वक़्त
नजर बडा ही शर्मसार रहता है

बदन के रेशे रेशे पे जिंदा हर पल
तेरे बोसे का प्यार रहता है

समंदर ने छोड दिया आना साहिल पे
किनारे की रेत पे तपिश बेशुमार रहता है

दुनिया के दामन में साजिश बहुत है
जिंदगी पे मौत का खौफ हमेशा बरकरार रहता है

25 comments:

महफूज़ अली said...

आजकल अखबार का समाचार पढते वक़्त
नजर बडा ही शर्मसार रहता है
bahut sah i kaha aapne,,,, bilkul aisa hi hai.....

aur maut ka dar to hamesha hi rehta hai.....


bahut hi achchi kavita.....

sada said...

जिन्‍दगी पे मौत का खौफ हमेशा बरकरार रहता है, बहुत ही अच्‍छी एवं लाजवाब प्रस्‍तुति ।

कुलवंत हैप्पी said...

अखबार वाली, साहिल वाली, मौत के खौफ वाली, लाजवाब हैं पंक्तियां

Prem said...

saral bhav achchi rachna

दिगम्बर नासवा said...

दुनिया के दामन में साजिश बहुत है
जिंदगी पे मौत का खौफ हमेशा बरकरार रहता है

सच में ....... हर तरफ मौत चलती है आज के दौर में ....... बहुत हि सहज रचना है ........ आपका लिखना बहुत कमाल का होता है .... आँखों से सीधा दिल में जाते हुवे ........

Nirmla Kapila said...

दिल से चले गये दर्दों का जाने क्यों इन्तज़ार रहता है। क्या खूब कहा। आप दिल मे डूब कर भावनायौ को खरोण्च कर निकाल लाते है। बहुत अच्छा लगता है आपको पढना। आपका कमेन्ट पा कर अभिभूत हूँ ।रिश्ते को मान ही लें अच्छा लगता है मुझे रिश्ते सहेजना। एक माँ को बच्चों से अधिक और कौन प्यारा हो सकता है बहुत बहुत शुभकामनायें

अम्बरीश अम्बुज said...

समंदर ने छोड दिया आना साहिल पे
किनारे की रेत पे तपिश बेशुमार रहता है
bahut sahi kaha aapne...

सागर said...

'कोशिश' दिख रही है... किनारे पर हाथ- पैर मार रहे हैं... तैरना सीख जायेंगे... यह लो... मैं तो ऐसे कह रहा हूँ जैसे खुद कित्ता बड़ा तैराक हूँ... पर लगा ऐसा ही... आप समझ रहे हैं ना मैं क्या कहने की कोशिश कर रहा हूँ...

रश्मि प्रभा... said...

zindagi pe maut ka khauf hi zindagi ko ek aayaam deta hai

दर्पण साह "दर्शन" said...

Om ji aapko pata hai na ki aapki har rachna zarror padhta hoon....
...kisi 'Favour' ke vaste nahi....
bus ki mujhe acchi chezein padhna pasand hai....

...tabhi to aap jaiseon se prerna lekhar kuch toota foota likh paata hoon !!
"और जो बच गये हैं बैठे हैं जाम लेके
होश इनको जरा ना-गवार रहता है"

mano maikada hai ye maun ka khali ghar....
...har post koi 'Sagar'
aur hum 'Rind'

wah kya khoob 'Mehfil-e-rindana' hai....
...wo yaad aa gaya dharam paa ji ka...
"Khoob jamegi jab..."


kahir...
ek baar phir 'Flawless'

दर्पण साह "दर्शन" said...

kahir=aakhir

Babli said...

बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने !

पी.सी.गोदियाल said...

समंदर ने छोड़ दिया आना साहिल पे,
किनारे की रेत पर तपिश बेसुमार रहता है !
बहुत प्यारा शेर

zindagi ki kalam se! said...

subhan allah!

अर्शिया said...

मौत का डर तो सबसे बडा ही होता है। उसे आपने बखूबी कविता में उतारा है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को प्रगति पथ पर ले जाएं।

योगेश स्वप्न said...

om ji , samandar wala shar dil ko bha gaya, behatareen. badhaai.

vinay vaidya said...

aapkee kavitaaen, sachmuch maun (dil)kee gahraaee se nikaltee hain.
badhaaee .

M VERMA said...

आजकल अखबार का समाचार पढते वक़्त
नजर बडा ही शर्मसार रहता है
====
अत्यंत शानदार और भावनात्मक गज़ल

raj said...

nahi milte to brso talak nahi milte.
jab milte hai to dard beshumar milte hai...
smunder or sahil ke fansle kabhi nahi mit te hai..mit te hai to ret pe pade pani ke nisha mit te hai...

pukhraaj said...

दिल तड़प तड़प के कह रहा है आ भी जा ...तू हमसे आँख न चुरा ...तुझे कसम है आ भी जा

दिल से चले गए दर्दों का
जाने क्यूँ इंतज़ार रहता है

आ भी जा ए दर्दे दिल ...आ भी जा तेरा ही इंतज़ार है ....
joking ...
bura na maniyega ..

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना भी. बधाई.

Aarjav said...

दिल से चले गये दर्दों का जाने क्यों बड़ा इन्तजार रहता है ! अच्छी लगी पंक्तियां !

वन्दना said...

दुनिया के दामन में साजिश बहुत है
जिंदगी पे मौत का खौफ हमेशा बरकरार रहता है

लाजवाब लिखा है……………………बहुत ही अलग अन्दाज़ रहा इस बार्।

विनोद कुमार पांडेय said...

आजकल अखबार का समाचार पढते वक़्त
नजर बडा ही शर्मसार रहता है

चंद लफ़्ज़ों में बेहद खूबसूरत बात कह गये आप...बड़ी सुंदर ग़ज़ल...एक संदेश देती हुई रचना...बहुत बहुत बधाई

Apoorv said...

दिल से चले गये दर्दो का
जाने क्यो बडा इंतज़ार रहता है
एक शेर याद आया..पता नही किसका है..मगर है लाखों मे एक..
दिल-ए-वीरां मे अरमानों की बस्ती तो बसाता हूँ
मुझे उम्मीद है हर आरजू गम साथ लायेगी

बदन के रेशे रेशे पे जिंदा हर पल
तेरे बोसे का प्यार रहता है

गालिब साहब वाला दांव दे दिया आपने

हाँ मगर शायद कुछ शब्द जैसे नजर और तपिश स्त्रीलिंग मे हो सकते हैं शायद!!
बधाई