Wednesday, October 21, 2009

तुमने कहा था इसलिए...

१)
चुप सी रहा करती है
एकदम निःशब्द आँखें हैं

लाख निचोड़ लो,
नहीं मिलता एक भी सुराग

बस बहती रहती है मुसलसल
चाहे कोई भी मौसम हो
ऐसे जैसे कोई खाली आसमान बरसता हो लगातार

कोई बताये उसे
कि नीचे खड़ा भींगता रहता है कोई उनमे

२)
इन दिनों
उग आया है एक पौधा
मेरे आँगन में
लाजवंती का

मैं उसकी तरफ देखने से बचता हूँ

वो कहा करती थी
मेरी आँखों का स्पर्श बहुत गहरा है

३)
भीतर का मौन
और बाहर का सन्नाटा
दोनों टूटे हैं एक साथ

चूल्हे पे चढ़े
आवाज का ढक्कन उड़ गया है

दरअसल कभी-कभी
बहुत शोर हो जाता है मुझसे

अक्सर तब,
जब याद आ जाती है
ज़माने की विसंगतियां
और हमारा सपना, बिखरा हुआ

28 comments:

GATHAREE said...

bhaavpoorn rachna

sada said...

कि बताये कोई उसे
नीचे खड़ा रह भीगता रहता है कोई

बहुत ही भावपूर्ण रचना एक कोमल स्‍पर्श लिये हुये बेहतरीन प्रस्‍तुति, बधाई ।

दिगम्बर नासवा said...

वो कहती थी ..........
मेरी आँखों का स्पर्श ..........
कमाल ओम जी लाजवाब पंक्तियाँ हैं ......... जीवन की राम कहानी लिख दी है आपने ..........
बहूत ही गहरे एहसास ..........

Mishra Pankaj said...

बस बहती रहती है मुसलसल
चाहे कोई भी मौसम हो
ऐसे जैसे कोई खाली आसमान बरसता हो लगातार


sundar likhaa hai aapane

raj said...

hairaan hun bolti ankhe nishabad bhi ho jati hai....or kabhi saprsh tak kar jati hai....barsne lagti hai to barsati jati hai....koee chupchap bheegta rahe unko kya...gahra moun choo ata hai ankho ke raste lajwanti ke poudhe ko or wo bina chuue hi chooeemuee ho jati hai.....or ye zmana koun hai??

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मैं उसकी तरफ देखने से बचता हूँ

वो कहा करती थी
मेरी आँखों का स्पर्श बहुत गहरा है

बहुत ही अधिक दिल को छु लेने वाली पंक्तियाँ है सनसनाहट सी हुई इनको पढ़ते हुए :) बहुत बढ़िया लिखा है आपने...

Science Bloggers Association said...

मन को छू लेने वाली कविता लिखी है आपने। बधाई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

वन्दना अवस्थी दुबे said...

क्या कहूं. खुद ही नि:शब्द हूं.

M VERMA said...

चूल्हे पे चढ़े
आवाज का ढक्कन उड़ गया है
क्या बिम्ब दिया है भावनाओ को. गहन और अत्यंत भावपूर्ण.

आनन्द वर्धन ओझा said...

ओम भाई,
समझ नहीं पाता कि वह कौन-सा शूल है जो कलेजे में ऐसा धंसा-फंसा है कि कविता बनकर रिसता रहता है... कतरा-कतरा... ! भावों को अनोखे बिम्बों में ढाल दिया है आपने ! शूल की शिनाख्त हो तो पता दीजियेगा, खोज कर चुभाऊंगा अपने कलेजे में भी; क्या पता कुछ ऐसा भी लिख सकूँ कभी...
साधु-साधु...!! सप्रीत, आ.

समयचक्र said...

बहुत सुन्दर भावः बधाई ...

रश्मि प्रभा... said...

har lamha,har padaaw sundar

गौतम राजरिशी said...

लेखनी आपकी कहर बरपाती है, ओम!

सोचता हूँ, हर पंक्ति को लेकर कुछ कहूं। किंतु आपके शब्द-सामर्थ्य के समक्ष खुद को असहाय पाता हूँ...तो बस मौन रह प्रशंसा करता हूं, मौन के इस खाली घर में।

mehek said...

behad khubsurat,lajawanti wali kavita bahut bha gayi.

योगेश स्वप्न said...

teenon hi rachnayen behatareen abhivyakti, om ji , kuchh dimaag to lagana padta hai magar bahut achcha lagta hai aapko padhna. badhaai.

ओम आर्य said...

प्रतिक्रियाएं कभी हौसला बढाती हैं, कभी प्यार से गले लगाती है, कभी कोई बहस का मुद्दा और कभी दिल के पुराने तार छेड़ जाती है. इनका अपना महत्व है. और मैं समय समय पे प्रतिक्रियाओं पर अपना आभार और प्यार व्यक्त करता रहता हूँ..जो मुझे हमेशा आप सबों के प्यार के मुकाबिले कम लगता रहा है. पर फिर सोंचता हूँ कि प्यार है तो कम या ज्यादा क्या..

आज से लगभग एक वर्ष पहले जब मैंने अपना ब्लॉग शुरू किया था तब मुझे ऐसा बिलकुल नहीं लगा था कि आप सबों का इतना प्यार मुझे मिलेगा. पर मिला और उम्मीद से ज्यादा भी मिला कई बार. इस बात की बेहद ख़ुशी है. मैंने काफी सारे एहसास बांटे आप सबों के साथ. पर दुःख भी है कि बहुत सारे लोग जो इस सफ़र में मुझसे जुड़े, उनका साथ मैं बरक़रार नहीं रख पाया. शायद समय की वजह से या फिर अपनी पसंद का दायरा सीमित होने के कारण.

शायद यह मेरी रचनाओं से भी पता चलता होगा कि भले मैं कर न पाऊं पर मेरी इच्छा हमेशा चीजों को आखिरी हद तक संभाल लेने की होती है चाहे वो कोई रिश्ता हो या फिर कविता. पर कई बार हम बेबस होते हैं...

मेरी इच्छा है कि यहाँ पर मैं उन सारे लोगों का नाम लेकर धन्यवाद करूं जो मुझे पढने का मौका देते रहें हैं या हौसला बढ़ाते रहे हैं या फिर दोनों करते रहे हैं. आज आनंद जी और गौतम जी का कमेन्ट...मुझे नहीं पता क्या कहा जाए...

आज ही मैंने अनुराग जी को उनके पोस्ट पर कमेन्ट लिखा कि 'इस आने वाली दुनिया की भाषा में हीं सही, गर इतनी तहजीब बची रह जाए, अपनापन बचा रह जाए, तो दुनिया शायद कितनी हीं दूरियां झेल लेंगी...' वो फेसबुक हो या ट्विटर हो, रिश्ते कहीं भी बन सकते हैं और आंसू की हद तक जा सकते है.

आप सबसे रिश्ते बन रहे हैं...मजबूत हो रहे हैं...अगर आने वाली दुनिया अनुराग जी के मुताबिक फेसबुक और ट्विटर पे चलने वाली है तो आशा है मैं अकेला नहीं रहूँगा...

Meenu Khare said...

लाजवाब कविता आपकी.

Udan Tashtari said...

क्या बात है ओम भाई..जबरदस्त रच गये...बहुत गंभीर!!!

sangeeta said...

मैं उसकी तरफ देखने से बचता हूँ

वो कहा करती थी
मेरी आँखों का स्पर्श बहुत गहरा है

bahut khoobsurat ehsaas .

अक्सर तब,
जब याद आ जाती है
ज़माने की विसंगतियां
और हमारा सपना, बिखरा हुआ

sundar abhivyakti..

अनिल कान्त : said...

भाई वाह आपका तो जवाब नहीं !!

महफूज़ अली said...

bahut hi bhaavpoorn aur achchi lagi yeh rachna.........

वन्दना said...

बस बहती रहती है मुसलसल
चाहे कोई भी मौसम हो
ऐसे जैसे कोई खाली आसमान बरसता हो लगातार

कोई बताये उसे
कि नीचे खड़ा भींगता रहता है कोई उनमे

gazab ka likha hai..........kahan se aise ahsaas late hain om ji.

मैं उसकी तरफ देखने से बचता हूँ

वो कहा करती थी
मेरी आँखों का स्पर्श बहुत गहरा है
behtreen .............lajwaab

aaj to shabd kam pad rahe hain tarif ke liye.

कंचन सिंह चौहान said...

कोई बताये उसे
कि नीचे खड़ा भींगता रहता है कोई उनमे

मैं उसकी तरफ देखने से बचता हूँ

वो कहा करती थी
मेरी आँखों का स्पर्श बहुत गहरा है


मैं बस एख बात नही समझ पाती कि कोई शख्स हर बार..हर बार ही इतना अच्छा कैसे लिख सकता है...!!!

सच में नही समझ पाती... और वर्ष पूरा करने की बधाई...!

रूपम said...

वहुत अच्छा लिखते है आप...
संवेदना का पूर्ण वहाब है रचना में ........

शोभना चौरे said...

वो कहा करती थी
मेरी आँखों का स्पर्श बहुत गहरा है

bahut khoob

Babli said...

बहुत ही शानदार, लाजवाब और दिल को छू लेने वाली रचना लिखा है आपने !

संजीव गौतम said...

आंखों को निचोडने,आवाज़ का ढक्कन उडने और अपने अंदर शोर होने के चित्र बहुत शानदार. बिलकुल अनूठे. बहुत बहुत बधाई

संजय भास्कर said...

मन को छू लेने वाली कविता लिखी है आपने। बधाई।