Saturday, October 31, 2009

अब क्या शहर और क्या गाँव !!

शहर
या तो
अलग – अलग क़तारों में
ख़ड़ा है
बंटा हुआ,
या
फिर उपस्थित है
दौड़ता हुआ
भागदौड़ क़ी परिधि पे,
अपनी पूरी थकान के बाबजूद

कुछ शहर जाने जाते हैं नहीं सोने के लिए
और कुछ कतार में भी दौड़ने के लिए

शहर को मैने
कभी फुरसत में नही देखा
ना हीं कभी एकजुट.

बहुत बड़ी-बड़ी कतारें
उपस्थित हैं
बहुत छोटी-छोटी जगहों में
जगह के बीच से
जगह निकालते हुए

एक टूटते हुए और
दूसरे बनते हुए कतार के बीच के
अंतराल को आप छू नही सकते
और ना हीं कतार बदलने वाले को

जरा सा भी असावधानी
आपको बे-कतार कर सकती है
और फिर आप किसी भी कतार के शिकार हो सकते हैं

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

24 comments:

महफूज़ अली said...

जरा सा भी असावधानी
आपको बे-कतार कर सकती है
और फिर आप किसी भी कतार के शिकार हो सकते हैं

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है
bahut hi gahri baat .......

पी.सी.गोदियाल said...

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

बहुत सुन्दर ,

बिना कतार का आदमी
अगर कहीं मिलता भी है
तो बस किसी नर्सिंग होम
या अस्पताल के बिस्तर पर !

रंजन said...

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है..

बहुत खुब...

अर्शिया said...

जीवन के एक पक्ष को आपने बहुत सुंदर तरीके से बयां किया है।
--------------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक
आइए आज आपको चार्वाक के बारे में बताएं

raj said...

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है...aadmi mil jaye ye bhi kismat ki baat hai..warna masheene kuch dodhti firti hai ktaaro me...admi koee ek do hi hote hai hzaaro me....kon aage nikal gya or kon rah gya peechhe..esi chinta me rahte hai kya lena unhe kudrat se ya uske nzaaro se....

नीरज गोस्वामी said...

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

कमाल कर दिया इन पंक्तियों में आपने...एक दम सच्ची बात...बहुत सुन्दर रचना...
नीरज

sada said...

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

क्‍या बात कही आपने इन पंक्तियों में बहुत गहराई लिये हुये, बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

Apoorv said...

ओम साहब..कभी-२ आपसे एक बड़ी मीठी सी शिकायत भी रहती थी..कि अपनी प्रतिभा के इतने विस्तृत वितान के बावजूद..आप अपनी दूसरी संवेदना की गिरहें क्यों कम खोलते हैं..मगर आपने लाजवाब कर दिया..
....जैसे आपकी कुछ कविताओं मे ख्वाब छुपते-दौड़ते हैं..कतार मे खड़े रहते हैं..वैसे ही यहाँ बेचैन शहरों को आपने पर्दे का कैरेक्टर बना दिया..जीता-जागता..
...आपकी तीक्ष्ण काव्य-दृष्टि से कुछ भी बचा नही रहता है....आपकी ही एक कविता याद आ गयी..मदर्स डे वाली (वैसे अक्सर याद आती रहती है)...
..शहरी-जीवन को अभिव्यक्त करने के लिये आपने शहर को ही प्रतीक बना दिया..वाह!!
..कम-स-कम मेरे लिये आपकी सबसे बेहतरीन कविताओं मे से एक..
और हाँ...हर बार आखिरी बॉल पे छक्का मारने की आपकी आदत आपको हिंदी-कविता ब्लॉगिंग का युवराज बनाती है..

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

M VERMA said...

जरा सा भी असावधानी
आपको बे-कतार कर सकती है
और फिर आप किसी भी कतार के शिकार हो सकते हैं
करीबी -- बहुत करीबी निरीक्षण

वन्दना said...

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

waah ..........kitni gahri baat kahi hai.

रश्मि प्रभा... said...

शहर-शहर , गांव-गांव इस कदर जाग उठे हैं कि कुत्ते ही सोने लगे हैं
कोई आये-जाये उन्हें फर्क नहीं पड़ता ....
भीड़, भागमभाग का सजीव चित्रण है

योगेश स्वप्न said...

shahar ki zindgi ka achcha chitran. bahut khoob badhaai.

Babli said...

वाह वाह क्या बात है! इस लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ !

दिगम्बर नासवा said...

MAHANAGAR KE BADHTE SHOR, UNKI LAMBI LAMBI KATAARON MEIN ULZHI JINDAGI .... BEKATAAR AADMI BHI AKSAR MIL JAATE HAIN .... APNI APNI MANJIL TALAASHTE PAR MAHANAGAR NIGAL JAATA HAI ..... SHAHER NIGAL JAATA HAI AADNI KO .....

BAHOOT HI GAHRI MAHANAGRI SOCH SE UPJI KAVITA HAI ..... BAHOOT ACHEE OM JI ...

Mishra Pankaj said...

ओम भाई सुन्दर कविता आभार आपका !!!

विनोद कुमार पांडेय said...

शहर की भागदौड़ में सब शहरवासी भी भाग रहे है पैसे कमाने के होड़ में इंसानियत और मानवता को धकियाए ..एक अलग और सुंदर कहानी कहती आपकी यह रचना..बेहद उम्दा भाव और शब्द तो है ही कमाल के..बहुत बहुत धन्यवाद ओम जी

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह भाई बहुत सुंदर.

सैयद | Syed said...

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
और अक्सर मुश्किल में मिलता है

..कमाल है ओम भाई...

अम्बरीश अम्बुज said...

एक टूटते हुए और
दूसरे बनते हुए कतार के बीच के
अंतराल को आप छू नही सकते
और ना हीं कतार बदलने वाले को
kataar badalne wale hi zindgi jee paate hain, baaki to zindgi se guzar jaate hain..

shikha varshney said...

जरा सा भी असावधानी
आपको बे-कतार कर सकती है
और फिर आप किसी भी कतार के शिकार हो सकते हैं

बिना कतार का आदमी
बड़ी मुश्किल से मिलता है
kya baat keh di aapne...gehre arth liye rachna...badhai aapko/

शरद कोकास said...

अब शहर भी दो तरह के हो गये है छोटे शहर औअर बडे शहर

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

bahut he gehri baat keh di om ji...
badhaayi....

सागर said...

यह देख कर बेहद ख़ुशी होती है की अपूर्व बहुत गहरायी से सबकी कविता और मेरी पोस्ट :) पढ़ते हैं... उनकी बातों से सहमत... उस खास शिकायत से भी हामी आप बुजुर्गों की तरह धीरे-धीरे बात खोलते हैं... हर बार अच्छी कविता के बाद एक अर्थपूर्ण कमेन्ट, जो सिलसिले को आगे बढा रही है... इसी एक शहर का बाशिंदा यह बन्दा भी है... इसलिए गहरे पैठी...

अर्कजेश said...

सच है ।
खासकर भारत में तो कतार की बडी समस्या है , हर जगह कतार है । कतार तक भी पहुंच गए तो बडी बात हुई । वरना तो अफ़रा-तफ़री और कतार तोड कर आगे जाने वालों का ही बोलबाला है ।