Tuesday, June 9, 2009

ध्यान

दुःख गर
बहुत गहरा हो जाए
और सारी चेतना
उसी दुःख के कील से बींध जाए तो
ध्यान का जन्म होता है

आजकल दोनों आँखों के बीच वाली जगह पे
चेतना
दुःख से बीन्धी हुई रहती है
और मैं ध्यान में .

8 comments:

विनय said...

अध्यात्म से जन्मी रचना

संध्या आर्य said...

आजकल दोनों आँखों के बीच वाली जगह पे
चेतना
दुःख से बीन्धी हुई रहती है
और मैं ध्यान में .

जब दर्द का कोहरा बहुत धन्ना हो जाये तो ऐसी रचना का जन्म होता है शायद......तभी गहरा ध्यान का जन्म होता है.....संजिदा भावाभिव्यक्ति...

AlbelaKhatri.com said...

moti raste par nahin beche jate omji
raaz-e-khudi yon khole nahin jate omji
___________________avmoolyan hota hai______

रंजना [रंजू भाटिया] said...

दुःख से बीन्धी हुई रहती है
और मैं ध्यान में

अच्छा कहा आपने ..

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

ध्यान और चेतना और बढ़िया कम शब्दों में अच्छे भाव पूर्ण रचना . बधाई अच्छा प्रयास है

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत खूब .

दिगम्बर नासवा said...

ध्यान और दुःख की बीच गहरा सम्बन्ध बनाती हुयी कविता............. सचमुच दर्द गहरा हो जाए तो इंसान ध्यान की अवस्था में आ जाता है

अक्षय-मन said...

bahut hi gehra aur bhav purn likha hai aapne........
accha laga aapke blog par aakar dhanyawaad..........