Tuesday, June 16, 2009

तेरी आवाज में मेरा नाम!

बियाबान मौन का है
और ये बंजारा जिस्म, मेरा
और एक भटकाव है उस मौन में
जो ख़त्म हीं नहीं होता

आँखे तेरी गुम हो गयी आवाज के निशाँ ढूँढती है

वक्त खानाबदोश हो गया है
रोज डेरा बदल लेता है
गाड़ देता है तम्बू , जहाँ भी कोई आहट ,
धुंधली सी भी आहट सुनाई दे जाती है
तेरी आवाज की

बस एक बार वो ध्वनियाँ मिल जाएँ
जिनमे तुम बुलाया करती थी मुझे
तो अपना वक्त उससे टांक दूं
और खत्म करून ये सफ़र.

18 comments:

Science Bloggers Association said...

तो अपना वक्‍त उससे टांक दूं।

बहुत खूबसूरत बात लिखी है आपने।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

AlbelaKhatri.com said...

waah !
umda kavita
khalis kavita !

अजय कुमार झा said...

बहुत ही भावपूर्ण रचान है ॐ जी..

विनय said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति

---
गुलाबी कोंपलें

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छे लगे इसके भाव शुक्रिया

Nirmla Kapila said...

हाँ मौन के खाली घर मे ऐसे ही भाव उगते हैं बहुत सुन्दर कविता है आभार्

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढ़िया रचना बधाई.

दिगम्बर नासवा said...

वक्त खानाबदोश हो गया है
रोज डेरा बदल लेता है

अपना वक्त उससे टांक दूं
और खत्म करून ये सफ़र.


क्या बात कही है ओम जी........... सचमुच कुछ तो चाहिए वक़्त को तारने के लिए और भी वो आवाज़ मिले जिसकी तलाश है............. तो हमेशा हमेशा के लिए बंधने को जे चाहेगा............. बहूत खूब

संध्या आर्य said...

ek khubasoorat rachana,jisame gaharaaee bahut hai ........jo sirf ek moun ki uapaja ho sakati hai.....sundar bhawanaa

M Verma said...

बस एक बार वो ध्वनियाँ मिल जाएँ
-------------------
तो अपना वक्त उससे टांक दूं
कितना नाज़ुक मिज़ाज है.
सुन्दर

रंजना said...

Waah !!! Shabdon kee lajawaab kalakari ki hai aapne..

Bhavpoorn Sundar rachna...

Udan Tashtari said...

बस एक बार वो ध्वनियाँ मिल जाएँ
जिनमे तुम बुलाया करती थी मुझे
तो अपना वक्त उससे टांक दूं

-ओह्ह! क्या बात कह गये! वाह!

ओम आर्य said...

mere manobhavon ko padhne,samajhne aur hausala badhane ke liye, bahut-bahut shukragujaar hoon aap sabka, aage bhi rahoonga. Aabhar!

SWAPN said...

wah, umda bhavpurn rachna.

मुकेश कुमार तिवारी said...

ओम जी,

दिल में गूंजती हुई आवाज को तलाशना कोलाहल से भरे जीवन में खोजना मुश्किल जरूर है असंभव नही।

जिन खोजा तिना पाईयां.....

सुन्दर मनोभावों वाली रचना उम्मीद बंधाती हुई कविता।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Pyaasa Sajal said...

shabd sanyojan bahut umda hai...achhi pakad nazar aayi


www.pyasasajal.blogspot.com

shama said...

Bohot dinon baad aapke blog pe aayee hun..3 rachnayen padhee...ye sabse adhik dilke qareeb mehsoos huee..
snehsahit
shama

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

ओम् भाई...

बहुत सुन्दर कविता....

मैं तो हमेशा से आपका फैन रहा हूँ. आपका एक ब्लॉग वेबदुनिया में भी पढ़ा है मैंने.