Friday, June 19, 2009

साकी

वहीं पे है पडा अभी तक वो जाम साकी
निकल आया तेरे मयखाने से ये बदनाम साकी

नजर में ठहरी हुई है वो तेरी महफिल अभी तक
जो पी आया तेरे होठो से एक कलाम साकी

हो न जाये ये परिंदा कोई गुलाम
कहते हैं शहर में बिछे हैं पिंजडे तमाम साकी

मुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे में
तमन्ना है तुझको करे सब सलाम साकी

लिखने लगे जो अपनी दास्तान साकी,
उसमें आने लगा बार बार तेरा नाम साकी

खुदा हाफिज़ करने में है न अब कोइ गिला
उसकी तरफ से आ गया है मुझको पैगाम साकी

23 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

हो न जाये ये परिंदा कोई गुलाम
कहते हैं शहर में बिछे हैं पिंजडे तमाम साकी...
बेहतरीन लाइनें .

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही सुन्दर

मुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे में
तमन्ना है तुझको करे सब सलाम साकी

नीरज गोस्वामी said...

बहुत अरसे बाद जाम और साकी पर ग़ज़ल पढ़ी है...ग़ज़ल के पुराने दिन लौट आये जैसे..
नीरज

Science Bloggers Association said...

अब तो तारीफ ले ले मेरी,

तूने बहुत प्‍यारी गजल सुनाई साकी।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार ओंम जी,
लाजवाब रचना है, मुझे ये शेर खासतौर से पसंद आया
"नजर में ठहरी हुई है वो तेरी महफिल अभी तक
जो पी आया तेरे होठो से एक कलाम साकी"

shama said...

Behad sundar rachana..Neeja ji ne sahee kaha !Itne,saral, sachhe alfaaz!

Mai aapko apnee nayee URL dene aayee hun..."The light by a loneley path" pe maine taqreeban likhna band kar diya hai..kaviata blog ke badle kal galteese us blogpe ek kavita post kar dee !

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in blogs pe aapko any sabhi blogs ke links mil jayenge!
Comment ke shukrguzar hun!

shama said...

Phir ekbaar isee rachnaa pe comment karnese khud ko rok nahee paa rahee hun...!

हो न जाये ये परिंदा कोई गुलाम
कहते हैं शहर में बिछे हैं पिंजडे तमाम साकी...

Is tarah kee kalpana aapke dimag me aatee kaise hai?

दिगम्बर नासवा said...

मुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे में
तमन्ना है तुझको करे सब सलाम साकी

ओम जी............ लाजवाब शेर कहे हैं आपने........... मज़ा आ गया

ARVI'nd said...

aapke es gazal ka nasha chha gaya hai...

‘नज़र’ said...

प्रभावशाली रचना

---
चर्चा । Discuss INDIA

अभिषेक ओझा said...

'मुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे में
तमन्ना है तुझको करे सब सलाम साकी'
वाह !

deepak sharma said...

मुझे मालूम है मेरी गुमनामी के बारे में
तमन्ना है तुझको करे सब सलाम साकी


bahout acha likha hai aap ne
jaam aur saki
wah wah

Shama said...

ओम , ...आपकी मेरे "कविता " ब्लॉग पे टिप्पणी पढी ...गर आप ऐसा नही लिखते तो यक़ीन मानिये , मै बिना टिप्पणी दिए चुपचाप निकल जाती ...!

और भी हैं , कहनेवाले ...
एक हमही नही अकेले ...!
snehadar sahit
shama

संध्या आर्य said...

सुन्दर भावो के साथ ..........साकी एक खुबसूरत रचना



खुदा हाफिज़ करने में है न अब कोइ गिला
उसकी तरफ से आ गया है मुझको पैगाम साकी

ये पंक्तियाँ मेरे दिल के करीब लगी ......
आभार

ज्योति सिंह said...

लिखने लगे जो अपनी दास्तान साकी,
उसमें आने लगा बार बार तेरा नाम साकी
bahut hi sundar rachana .aap mere blog na aate to aapki kavita padhne ka aanand na milata .is raste se jodne ke liye shukriya .

Nitish said...

bahut uttam kavya mantra mukta kar diya.... aanand se bhar diya....

GAURAV said...

achha nasha karwaya aapne.... bahut achha likha hai aapne

ओम आर्य said...

आप सब का आर्शीवाद सर आँखों पे. आशा है कृपा बनाये रखेंगे.

महेन्द्र मिश्र said...

खुदा हाफिज़ करने में है न अब कोइ गिला
उसकी तरफ से आ गया है मुझको पैगाम साकी

बहुत सुन्दर...

Navnit Nirav said...

ek behad prabhvshali gazal ki rachana ki hai aapne.

शोभना चौरे said...

हो न जाये ये परिंदा कोई गुलाम
कहते हैं शहर में बिछे हैं पिंजडे तमाम साकी

sashkt abhivykti.

venus kesari said...

वहीं पे है पडा अभी तक वो जाम साकी
निकल आया तेरे मयखाने से ये बदनाम साकी

बहुत सुन्दर
वीनस केसरी

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

रिंद, मयखाना,शराब, मीना और जाम साकी,
इसी में ढूंढ़ते रहे वजूद अपना ,उम्र तमाम साकी ||
बिखरता नहीं कोइ वजूद तेरी बेरुखी से ऐ साकी ,
नश्तर है तेरी बेरुखी नज़रें इनायत पाने के बाद ||